असलहे के नए लाइसेंस भी अब इक्का-दुक्का ही बन रहे हैं। असलहों की मरम्मत के लिए भी यदा-कदा ही कोई आता है। ऐसे में भला हम कितने एयर गन बेचें और उससे कितना कमा पाएंगे। इसीलिए लोगों ने इस धंधे से दूरी बना ली और दूसरा काम शुरू कर दिया।
बंदूक जमा कर लोग भूल जा रहे, किराया भी नहीं दे रहे
शहर की असलहा-कारतूस की 11 दुकानों में मौजूदा समय में 3000 शस्त्र जमा हैं। इनमें से 500 बंदूक है। शस्त्रालय में एक असलहा रखने का प्रति माह का किराया 300 रुपये है। अमरजीत सिंह ने कहा कि बंदूक की वैल्यू जीरो है। लाइसेंस रिन्युअल कराने में खर्च लगभग 10 हजार रुपये आता है।
लोग शस्त्रालय में बंदूक जमा कर देते हैं और फिर न उसका किराया देने आते हैं और न ले जाते हैं। जो असलहे शस्त्रालयों में जमा हैं, उन्हें मालखाने में जमा कराने की मांग सरकार से लगातार की जा रही है, लेकिन सुनवाई नहीं हो रही है।
अमरजीत सिंह ने कहा कि सरकार के स्तर से ध्यान नहीं दिया जाएगा तो शस्त्रालय के संचालकों की स्थिति नहीं सुधरेगी। 10-12 वर्ष पहले हम महीने में 20 असलहे बेच लेते थे और अब दो भी नहीं बेच पाते हैं। सरकार व्यापारी, डॉक्टर जैसे वर्ग के लोगों को सुरक्षा के लिए असलहे का लाइसेंस दे। दूसरी बात यह है कि वरासत के लाइसेंस बनाने की प्रक्रिया आसान कर उनकी संख्या बढ़ाई जाए। तीसरी बात यह है कि अब 24 की जगह 11 दुकानें ही रह गई हैं तो हमारे यहां शस्त्र जमा करने का कोटा बढ़ाया जाए।