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अनरथ अवध अरंभेउ जब तें...

Tue, 27 Sep 2016 01:52 AM IST
ब्यूरो/अमर उजाला, वाराणसी
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डंका बजने के साथ ही सोमवार की शाम एक तरफ किले से हाथी पर सवार काशिराज अनंत नारायण सिंह की शाही सवारी निकली तो दूसरी ओर नत्थू पहलवान के अखाड़े के पास अपने ननिहाल से घोड़े पर सवार होकर भरत-शत्रुघ्न अयोध्या गुरु वशिष्ठ का संदेश पाकर अयोध्या के लिए चल पड़े। अयोध्या में अनर्थ के बुरे सपने आने से चिंतातुर भरत राजमहल में पहुंचते ही वहां का शोकाकुल माहौल देख व्याकुल हो गए। राजा के मरण और राम के वन गमन से तमतमाए शत्रुघ्न के मंथरा पर प्रहार से लेकर राम को मनाने के लिए चित्रकूट के लिए प्रयाण की लीला देखने के लिए हजारों की तादाद में पारंपरिक वेश में लीला प्रेमियों का सैलाब उमड़ पड़ा था।
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अनरथ अवध अरंभेउ जब तें/कुसगुन होहिं भरत कहुं तब तें/खर सियार बोलहिं प्रतिकूला/ सुनि सुनि होई भरत मन सूला/सुनि सत्रुघुन मातु कुटिलाई/जरहिं गात रिस कछु न बसाई/तेहि अवसर कुबरी तंह आई/बसन बिभूषन बिबिध बनाई/हुमगि लात तकि कूबर मारा/परि मुंह भर महि करत पुकारा/बिलपहिं बिकल भरत दोउ भाई/कौसल्या लिए हृदयं लगाई...। नत्थू पहलवान के अखाड़े के पास बने ननिहाल में वशिष्ठ के दूतों के पहुंचने से लीला शुरू हुई। घोड़े पर सवार होकर भरत-शत्रुघ्न अयोध्या के लिए चल पड़े। भरत के आने की खबर सुनते ही कैकेयी आरती लेकर दौड़ती हैं। उन्हें राजमहल ले जाकर मायके का हालचाल पूछने लगती हैं। महल में सूनापन देख चिंतित भरत पूछते हैं कि राम, सीता , लक्ष्मण कहां है? कैकेयी कुटिलता से जवाब देती हैं कि महाराज सुरधाम सिधार गए। राम को वन जाना पड़ा। ऐसे में राजपाट अब तुम्हारे हवाले है। इसने में भरत क्रोधित हो जाते हैं। वह मां कैकेयी को पापिन कहकर संबोधित करते हैं? कहते हैं कि तुमने तो कुल का नाश कर डाला। यही करना था तो मुझे जन्म होते ही क्यों नहीं मार डाला। इतने में कुबड़ी मंथरा सज धज कर वहां पहुंचती है। शत्रुघ्न उसे देख बाल पकड़कर घसीटने लगते हैं। भरत व्याकुल होकर विलाप करती मां कौशल्या के पास पहुंचते हैं और उन्हें गले से लगा लेते हैं। भरत अपनी माताओं और अयोध्यावासियों से कहते हैं कि तुम लोग अयोध्या का ख्याल रखना हम राम के पास जा रहे हैं। भरत-शत्रुघ्न तमसा नदी के किनारे पहुंचते हैं। इसके बाद भरत शृंगवेरपुर पहुंचते हैं। वहां गंगा को प्रणाम कर रात भर जगने के बाद प्रयाग पहुंचते हैं। जिन रास्तों से राम, सीता गुजरे थे उनके पदचिह्नों को प्रणाम करते हुए भरत आगे बढ़ते हैं। फिर भारद्वाज मुनि के आश्रम में कंदमूल फल खाकर विश्राम करते हैं। सगरा पोखरा से छेदू पहलवान के अखाड़े के पास भारद्वाज आश्रम में पहुंचकर आरती हुई।
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