कांग्रेस के कहर को उजागर करने के लिए उनका एक कॉलम नेहरू के नाम पाती, इंदिरा के नाम पाती ने तानाशाही के खिलाफ जनता को उद्वेलित कर दिया था, इसलिए आपातकाल के दौरान उनको जेल भी जाना पड़ा। पूरे देश की हिंदी पत्रकारिता को नवांकुर देने में भइया जी का बहुत बड़ा हाथ था।
‘अरबी न फारसी भइया जी बनारसी’ नाम के काॅलम ने पूरे शहर में कवित्व की समझ पैदा कर दी। एक बार क्वीन एलिजाबेथ के बुलावे पर जब भइया जी लंदन पहुंचे, तो वहां महारानी ने उनसे पूछा कि आपके अखबार में कितने लोग काम करते हैं। उनका यह प्रश्न अंग्रेजी में था, लेकिन भइया जी ने जानबूझकर हिंदी में उत्तर में दिया कि हम छह लोग छठी का दूध याद दिलाते हैं, तानाशाही को।
क्वीन को ये बात समझ नहीं आई और उन्होंने भइया जी से निवेदन किया। कृपया इसे अंग्रेजी में बोलिए लेकिन अक्खड़ी भइया जी ने उनको जवाब दिया कि आपको यदि हिंदी में बोलने को कहा जाए तो आप बोलेंगी? इसलिए मैं अंग्रेजी में नहीं बोलूंगा। ये था उनका हिंदी, हिंदू, हिंदुस्तान के प्रति प्रेम।