प्रो. हरिकेश सिंह, पूर्व कुलपति, लोकनायक जयप्रकाश नारायण विश्वविद्यालय, छपरा
शैक्षणिक कार्यों को पूरी तरह से रोकना ठीक नहीं
कोरोना के कारण शैक्षणिक चुनौतियां बढ़ गई हैं। हालांकि यह तात्कालिक चुनौतियां हैं। शैक्षणिक कार्य को पूरी तरह से रोक देना ठीक नहीं है। जिन विश्वविद्यालय और महाविद्यालयों में प्रवेश परीक्षा फार्म भरे जा चुके हैं, उन्हें प्रवेश परीक्षा कराने पर विचार करना चाहिए। प्रवेश परीक्षा यदि संभव नहीं है तो मेधा सूची के आधार पर प्रवेश प्रक्रिया शुरू करनी चाहिए। सीबीएसई की रुकी परीक्षाओं को निरस्त करने के बजाय उन्हें कराने पर विचार करना चाहिए। अनिश्चितता नहीं होनी चाहिए। रही बात राष्ट्रीय स्तर की प्रतियोगिताओं की तो सोशल डिस्टेंसिंग का ध्यान रखते हुए केंद्रों की संख्या बढ़ाकर परीक्षा ली जा सकती है। शोध छात्रों पर खास ध्यान देना होगा और उनकी गतिविधियां शुरू करने में मदद करनी होगी। 8वीं तक के विद्यालय फिलहाल बंद रहें और माध्यमिक स्तर के विद्यालयों में प्रवेश प्रक्रिया शुरू कर देनी चाहिए। -प्रो. हरिकेश सिंह, पूर्व कुलपति, लोकनायक जयप्रकाश नारायण विश्वविद्यालय, छपरा
प्रो. टीएन सिंह, कुलपति, काशी विद्यापीठ
ऑनलाइन शिक्षा क्लास रूम शिक्षा का विकल्प नहीं
कोरोना महामारी ने शिक्षा जगत के सामने कई चुनौतियां खड़ी कर दी हैं। इसलिए तकनीक के माध्यम से चुनौतियों का सामना किया जा रहा है। मगर, ऑनलाइन शिक्षा क्लास रूम शिक्षा का विकल्प नहीं बन सकती है। छात्रों के प्रवेश, प्रमोशन और परीक्षा के मुद्दे पर विश्वविद्यालय पूरी तरह से स्वतंत्र नहीं है। शासन के निर्देशानुसार ही निर्णय लिया जाता है। विश्वविद्यालय केवल एक इकाई नहीं है, उससे कई जनपदों के महाविद्यालय भी जुड़े हुए हैं। सभी की अपनी-अपनी समस्याएं है। सभी के साथ समन्वय बनाकर ही बेहतर विकल्प तलाशा जा सकता है। वर्तमान में जो चुनौतियों को स्वीकार करेगा, उसका सामना करेगा वही आगे बढ़ेगा। यह संयम रखने का समय है। तकनीक सभी को अपनानी होगी। जहां तक छात्रों को प्रमोट करने की बात है तो यह उनके भविष्य के साथ खिलवाड़ होगा। -प्रो. टीएन सिंह, कुलपति, काशी विद्यापीठ
प्रो. पृथ्वीश नाग, पूर्व कुलपति, महात्मा गांधी काशी विद्यापीठ
च्वाइस बेस्ड सिस्टम के साथ लागू करना होगा हाइब्रिड सिलेबस
गुरु शिष्य परंपरा वाली संस्कृति में ऑनलाइन शिक्षा लागू करना चुनौती से कम नहीं है। कोरोना संकट के कारण तकनीक का इस्तेमाल करते हुए हमें आगे बढना होगा। प्रयास करना होगा कि हम ऐसा प्लेटफार्म विकसित कर सकें जहां छात्र शिक्षकों से सीधा संवाद कर सकें। ऑनलाइन शिक्षा फुल प्रूफ सिस्टम नहीं है, बस एक विकल्प विकसित करने की बात है। वर्तमान में यह पारंपरिक शिक्षा का एक विकल्प है। इस वैकल्पिक सिस्टम पर अध्ययन जारी रखना होगा। च्वाइस बेस्ड सिस्टम के साथ ही हाइब्रिड सिलेबस पर विचार करना होगा। इसमें वर्चुअल और आफलाइन शिक्षा दोनों शामिल हों। कोरोना ने हमें एक मौका दिया है कि हम शिक्षा के लिए वैकल्पिक संसाधन विकसित कर सकें। -प्रो. पृथ्वीश नाग, पूर्व कुलपति, महात्मा गांधी काशी विद्यापीठ
डॉ. दीपक मधोक, अध्यक्ष, सनबीम शिक्षण समूह
ऑनलाइन कक्षाओं के अलावा दूसरा विकल्प नहीं
कोरोना ने हमें स्वयं में सीमित कर दिया है। वर्तमान स्थिति में शैक्षणिक गतिविधियां वर्चुअल हो गई हैं। शैक्षणिक गतिविधियों को पूरी तरह से बंद करना ठीक नहीं है। किसी भी चीज को बंद करना तो आसान है, लेकिन उसे चलाने के लिए कार्ययोजना बनानी होती है। जो हालात हैं उसमें ऑनलाइन कक्षाओं के अलावा दूसरा कोई विकल्प नहीं है जिससे छात्रों को शिक्षा दी जा सके। स्कूलों के खुलने के समय पर अभी संशय बना हुआ है। ऐसे में लर्निंग स्क्रीन टाइम को बढ़ाकर हम शिक्षा जारी रख सकते हैं। ऑनलाइन कक्षाओं का संचालन आसान नहीं है। क्लास रूम से ज्यादा अध्यापक इसमें मेहनत कर रहे हैं। छात्रों के बेहतर भविष्य के लिए इस समय सभी को अपना योगदान देना होगा। -डॉ. दीपक मधोक, अध्यक्ष, सनबीम शिक्षण समूह
डॉ. विश्वनाथ दुबे, प्रदेश संयोजक, प्रधानाचार्य संघ
आपदा को बदल सकते हैं अवसर में
यह समय आपदा को अवसर में बदलने का समय है। हम सभी अपने स्तर से प्रयास कर रहे हैं कि शैक्षणिक गतिविधियां निरंतर जारी रहें। संक्रमण को देखते हुए फिलहाल छात्रों को स्कूल में बुलवाना ठीक नहीं है, लेकिन शिक्षकों को स्कूल जरूर बुलाया जाए। जब विद्यालय खुलेगा और शिक्षक आएंगे तो छात्र भी सीमित संख्या में समस्याओं के समाधान के लिए स्कूल आ सकते हैं। परीक्षाओं के लिए जहां चैप्टर कम करने की बात हो रही है तो यह ठीक नहीं है। चैप्टर घटाने के बजाय प्रश्नपत्रों को छोटा किया जाना चाहिए। परीक्षाओं के स्वरूप में भी बदलाव किया जा सकता है। मासिक टेस्ट के साथ ही त्रैमासिक परीक्षाओं का भी आयोजन किया जा सकता है। बच्चों के मूल्यांकन के लिए यह बेहतर विकल्प साबित होगा। -डॉ. विश्वनाथ दुबे, प्रदेश संयोजक, प्रधानाचार्य संघ
दीपक बजाज, निदेशक, सेठ एमआर जैपुरिया स्कूल
ऑनलाइन शिक्षा है समय की मांग
ऑनलाइन शिक्षा समय की मांग है। कोरोना ने हर किसी को यह बता दिया है कि आवश्यकता अविष्कार की जननी है। यह कटु सत्य है कि ऑनललाइन शिक्षा क्लासरूम शिक्षा का विकल्प नहीं हो सकती है। कैंपस और क्लासरूम में जो माहौल बच्चों को मिलता है वह ऑनलाइन उपलब्ध नहीं हो सकता है। महामारी के कारण लंबे अंतराल के लिए शिक्षण संस्थाओं के बंद होने के कारण ऑनलाइन शिक्षा ने छात्रों को संबल दिया है। नहीं तो उनका रूटीन दिशाहीन हो जाता। ऑनलाइन कक्षाओं के साथ ही समर कैंप का भी आयोजन किया गया। स्कूल कब तक खुलेंगे, इस पर अभी संशय है। जब हमें कोरोना के साथ ही जीने की आदत डालनी है तो निश्चित दिशा निर्देशों के साथ स्कूलों के संचालन की कार्ययोजना तय करनी होगी। इम्युनिटी सिस्टम को मजबूत बनाना होगा और स्कूलों के संचालन पर विचार करना होगा। -दीपक बजाज, निदेशक, सेठ एमआर जैपुरिया स्कूल
प्रो. योगेंद्र सिंह, पूर्व कुलपति, जननायक चंद्रशेखर विश्वविद्यालय बलिया
शिक्षा बाजार आधारित नहीं संस्कार आधारित होनी चाहिए
ऑनलाइन शिक्षा विकल्प का रूप लेगी, क्या हमारा सिस्टम इसके लिए तैयार है, यह सबसे बड़ा प्रश्न है। भारत की अधिकांश आबादी गांवों में बसती है और सभी के पास इतने संसाधन नहीं हैं। ऑनलाइन शिक्षा के साथ ही हमारे देश में बहुत सी चुनौतियां हैं। यूजीसी ने जो सर्वे जारी किया है उसके हिसाब से हम ऑनलाइन शिक्षा के लिए पूरी तरह से तैयार नहीं हैं। सभी को यह विचार करना होगा कि शिक्षा बाजार आधारित नहीं संस्कार आधारित होनी चाहिए। ऑनलाइन शिक्षा में छात्रों के ऑनलाइन एडिक्शन का भी खतरा है। हर चीज के दो पहलू होते हैं। ऐसे में हमें ऑनलाइन शिक्षा के दोनों पहलुओं पर नजर रखनी होगी। शिक्षकों और छात्रों को प्रशिक्षित करना होगा। इसके बाद ही इसको वैकल्पिक बनाने पर विचार करना होगा। -प्रो. योगेंद्र सिंह, पूर्व कुलपति, जननायक चंद्रशेखर विश्वविद्यालय बलिया
प्रो. राजाराम शुक्ल, कुलपति, संपूर्णानंद संस्कृत विश्वविद्यालय
ऑनलाइन कक्षाओं से गुरु शिष्य परंपरा पर संकट
संस्कृत विश्वविद्यालय और महाविद्यालयों में संसाधनों का अभाव है। ऐसे में वहां पर ऑनलाइन शिक्षा व्यवस्था को लागू कर पाना आसान नहीं है। हमें एक नई शिक्षा पद्धति पर विचार करना होगा, जिसमें वर्चुअल और पारंपरिक दोनों समाहित हों। हमारे देश में संसाधनों की चुनौतियां अधिक है। ऑनलाइन कक्षाओं से गुरु शिष्य परंपरा पर भी संकट खड़ा हो सकता है। खासकर, संस्कृत विश्वविद्यालय में अध्ययन-अध्यापन का कार्य इसी परंपरा के तहत प्राचीन काल से चला आ रहा है। इसमें जो भाव होता है, जो अध्ययन होता है, उसे हम ऑनलाइन नहीं कर सकते हैं। वर्तमान स्थिति को देखते हुए इसको विकल्प के तौर पर शामिल किया जा सकता है, लेकिन इस पर निर्भरता शिक्षा और शिक्षा जगत के लिए बेहतर नहीं है। यह संप्रेषण का बेहतर माध्यम तो हो सकता है, लेकिन अध्ययन का नहीं। -प्रो. राजाराम शुक्ल, कुलपति, संपूर्णानंद संस्कृत विश्वविद्यालय
राहुल सिंह, निदेशक, संत अतुलानंद एकेडमी
संक्रमण काल में वरदान बनी ऑनलाइन शिक्षा
कोरोना संक्रमण काल में ऑनलाइन शिक्षा छात्रों के लिए वरदान साबित हुई है। ऑनलाइन शिक्षा नहीं होती तो बच्चे अवसाद में चले जाते। ऑनलाइन कक्षाओं के साथ ही ऑनलाइन गतिविधियों के जरिए बच्चों को रचनात्मकता के साथ नई-नई चीजें सीखने को मिलीं। यह अलग बात है कि हर पहलू का एक स्याह पक्ष भी होता है। अच्छाई के साथ बुराई भी होती है। संकट के समय में जो सबसे बेहतर विकल्प था, वह ऑनलाइन शिक्षा ही थी। शिक्षण संस्थानों ने इसका बखूबी इस्तेमाल किया। इसने सभी को एक प्लेटफार्म और बेहतर विकल्प सुझाया है। यह मंथन का विषय है कि इससे बेहतर और दूसरा रास्ता क्या हो सकता है। फिलहाल जो उपलब्ध है वही सबसे बेहतर है। स्कूलों को खोलने पर फिलहाल कोई तिथि निर्धारित नहीं है और यह कितना लंबा चलेगा कुछ कहा नहीं जा सकता है। -राहुल सिंह, निदेशक, संत अतुलानंद एकेडमी