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हिंदी दिवस 2022: हिंदी को अलग पहचान दिलाने वाली नागरी प्रचारिणी सभा का हाल बेहाल, लड़ रही अस्तित्व की लड़ाई

Wed, 14 Sep 2022 12:01 PM IST
किरन रौतेला न्यूज डेस्क, अमर उजाला, वाराणसी

सार

हिंदी को शब्दों का अनुशासन और व्याकरण देने वाली संस्था नागरी प्रचारिणी सभा सवा सौ साल के इतिहास में सबसे खराब दौर से गुजर रही है। 
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नागरी प्रचारिणी सभा वाराणसी - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
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20 हजार पांडुलिपियां, 50 हजार पुरानी पत्रिकाएं और 1.25 लाख से अधिक ग्रंथों का भंडार। अंदाजा लगाया जा सकता है कि यह अथाह ज्ञान राशि कितनी अमूल्य होगी और इसे संजोने वाले कितने महान। 12 खंडों में प्रकाशित शब्द सागर, हिंदी विश्वकोष और 16 खंडों में प्रकाशित वृहद इतिहास का ऐतिहासिक महत्व है।
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हिंदी को शब्दों का अनुशासन और व्याकरण देने वाली संस्था नागरी प्रचारिणी सभा सवा सौ साल के इतिहास में सबसे खराब दौर से गुजर रही है। पदाधिकारियों के चुनाव का मामला लंबित होने के कारण नागरी के पुनरुद्धार का खाका भी तैयार नहीं हो सका है। हिंदी को दुनिया में अलग पहचान दिलाने वाली सभा अब अस्तित्व की लड़ाई लड़ रही है। सभा पर स्वामित्व के लिए खींचतान तो हो रही है लेकिन सवा सौ साल से अधिक पुरानी धरोहर को संजोने के बारे में न तो कोई सोच है और न ही कार्ययोजना। हिंदी साहित्य से जुड़े साहित्यकारों को हिंदी के इस गढ़ के खत्म होने का अंदर-अंदर मलाल है। हिंदी की इस थाती के संरक्षण के लिए संस्था के पास पर्याप्त धन नहीं है। मामूली मानदेय पर तैनात कर्मचारी इसकी रखवाली कर रहे हैं। 

नागरी प्रचारिणी सभा - फोटो : अमर उजाला
स्वतंत्रता आंदोलन में रहा है नागरी का योगदान
साहित्यकार डॉ. इंदीवर पांडेय का कहना है कि खड़ी बोली हिंदी को आकार देने वाली नागरी प्रचारिणी सभा आज बदहाली के दौर से गुजर रही है। इसका स्वतंत्रता आंदोलन में भी बहुत बड़ा योगदान रहा है। सभा ने अभियान चलाकर मठों-मंदिरों व राजाओं के यहां पड़ी पुस्तकों की न केवल खोज की बल्कि इनकी प्रमाणिकता भी सिद्ध की। यह संस्था राष्ट्रीय धरोहर है। सरकार को संरक्षण की पहल करनी चाहिए। 

मालवीय जी ने स्थापित किया था हिंदी साहित्य सम्मेलन
साहित्यकार डॉ. जितेंद्रनाथ मिश्र का कहना है कि हिंदी की सबसे प्राचीन शोध पत्रिका नागरी प्रचारिणी पत्रिका है। यह सन 1897 से प्रकाशित हो रही है। मालवीय जी ने यहीं हिंदी साहित्य सम्मेलन की स्थापना की। 129 साल पुरानी नागरी प्रचारिणी सभा ने कई झंझावात देखे, स्वतंत्रता आंदोलन की गवाह रही। हिंदी के लिए चलने वाले आंदोलनों को भी इसने अपने आंचल में वट वृक्ष बनाया। वक्त के थपेड़ों ने इस गढ़ को अब जर्जर कर दिया है। 
 
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नागरी प्रचारिणी सभा। - फोटो : अमर उजाला
हिंदी के उत्थान के लिए हुई थी स्थापना
नागरी प्रचारिणी सभा के सहायक मंत्री बृजेश चंद्र पांडेय ने बताया कि हिंदी भाषा के उत्थान व प्रचार के लिए नागरी प्रचारिणी सभा की 1893 में स्थापना हुई थी। क्वींस इंटर कॉलेज के बरामदे में नौवीं कक्षा के छात्र बाबू श्यामसुंदर दास, पं. रामनारायण मिश्र और शिवकुमार सिंह ने इसकी बुनियाद रखी थी। सभा के प्रयत्न से सन् 1900 से उत्तर प्रदेश तत्कालीन संयुक्त प्रदेश में हिंदी के प्रयोग की आज्ञा हुई और सरकारी कर्मचारियों के लिए हिंदी और उर्दू दोनों भाषा अनिवार्य कर दिया गया।

हिंदी के लिए काशी में पहला सत्याग्रह
नव गीतकार सुरेंद्र वाजपेयी का कहना है कि 1905 में जब कांग्रेस का अधिवेशन हुआ तो इसमें भाषा सम्मेलन भी आयोजित हुआ। प्रचारिणी के प्रांगण में लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक ने घोषणा कर कहा कि हिंदी ही भारत की राष्ट्रभाषा हो सकती है और देवनागरी लिपि वैकल्पिक रूप से भारत की सभी भाषाओं के लिए इस्तेमाल होनी चाहिए। हिंदी के लिए काशी में पहला सत्याग्रह सभा ने ही किया था।
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