जातीय समीकरणों के हिसाब से गठबंधन के बाद 2014 के मुकाबले पूर्वांचल में स्थिति बेहतर मानी जा रही है। वाराणसी से आजमगढ़ तक के नेता और कार्यकर्ता दावा कर रहे हैं कि अखिलेश आजमगढ़ से चुनाव लड़ेंगे। इससे उनको आसपास की एक दर्जन सीटों पर फायदे की भी उम्मीद है।
2017 के विधानसभा चुनाव में आजमगढ़ जिले की 10 में से नौ सीटों पर सपा-बसपा उम्मीदवार जीते थे। आजमगढ़ संसदीय क्षेत्र के पांच विधानसभा क्षेत्रों में तीन पर सपा और दो पर बसपा का कब्जा है। 2014 में बसपा से लड़े शाह आलम उर्फ गुड्डू जमाली मुबारकपुर से विधायक हैं। दूसरी ओर सीट से भाजपा के पास फिलहाल रमाकांत यादव के अलावा मजबूत प्रत्याशी नहीं है।
2014 में दूसरे स्थान पर रहे रमाकांत मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के करीबी रहे हैं। हालांकि रमाकांत प्रदेश सरकार की कार्यशैली पर कई बार उंगली उठा चुके हैं। बावजूद इसके आसार हैं कि पार्टी उन्हीं पर दांव लगाएगी। अन्यथा की स्थिति में भाजपा ‘हैवीवेट’ उतार सकती है।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी(फाइल फोटो)
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वाराणसी में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से मुकाबले के लिए सपा सेवापुरी के पूर्व विधायक और मंत्री रहे सुरेंद्र सिंह पटेल को उम्मीदवार बनाने जा रही है। पार्टी का फोकस पटेल मतदाताओं के साथ-साथ पिछड़ों और मुसलमानों पर है। बलिया से नीरज शेखर का नाम भी तय माना जा रहा है।
हालांकि सपा के खाते में आई चंदौली सीट पर पिछले चुनाव में भाजपा प्रदेश अध्यक्ष के मुकाबले तीसरे स्थान पर रहे पूर्व सांसदों राम किशुन यादव और आनंद रत्न मौर्य के नाम पर पेच फंस गया है।
वहीं, आजमगढ़ जिले के युवा से लेकर बुजुर्ग एक स्वर में सपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव को आजमगढ़ से चुनाव लड़ने की मांग कर रहे है। सपा नेता एसके सत्येन, सुनील विश्वकर्मा के अलावा शिब्ली कॉलेज के छात्र नेता अखिलेश यादव को आजमगढ़ के सांसद के तौर पर देखना चाहते है।
छात्रों का कहना है कि अखिलेश को जिताने में युवा जी जान लगा देंगे। सपा के जिलाध्यक्ष हवलदार यादव ने बताया कि हम लोग काफी दिनों से मांग कर रहे हैं कि नेता जी के इस सीट से उनके पुत्र अखिलेश यादव ही चुनाव लड़े।