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अब प्रतिद्वंद्वी को ‘धूल’ चटाएंगे पहलवान

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वाराणसी। काशी के प्राचीन मिट्टी के अखाड़ों में रौनक फिर से लौटने लगी है। हो भी क्यूं न... अखिर नागपंचमी जो नजदीक है। दरअसल, इस दिन अखाड़ों में पहलवान प्रतिद्वंद्वी को धूल चटाने के लिए जोर आजमाइश करते हैं। दरअसल, वर्ल्ड रेसलिंग एसोसिएशन से मान्यता मिलने के बाद इसकी रंगतलौटाने की कोशिशें शुरू हो गई हैं। यही कारण है कि भारतीय कुश्ती संघ परंपरागत कुश्ती को जीवित करने के लिए न केवल कई आयोजन करा रहा है, बल्कि नए अखाड़े भी बनाए जा रहे हैं। इतना ही नहीं महिला पहलवानों को भी पुरानी विधाओं से जोड़ा जा रहा है।
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पूर्वांचल के पहलवानों ने न केवल देश बल्कि विदेशों में भी अपनी ताकत और दांव पेंच का लोहा मनवाया। ओलंपियन चिक्कन पहलवान ने काशी का नाम देश दुनिया में किया। पहलवानों की नर्सरी कही जाने वाली काशी का अखाड़ों से पुराना रिश्ता रहा है। नागपंचमी पर यह और भी खास हो जाता है। एक वक्त पर अखाड़ो के रंगाई पुताई से लेकर अखाड़ों की मिट्टी की कोड़ाई संग उसे नया स्वरूप देने का काम साल भर चलता था। वक्तबदला अब मिट्टी के परंपरागत अखाड़ों की जगह गद्दे वाले अखाड़ों ने ले लिया। अंतरराष्ट्रीय मुकाबलों में गद्दे पर कुश्ती होने की मजबूरी भी परंपरागत अखाड़ों के अस्तित्व पर संकट लगने लगा। जहां, काशी के सबसे पुराने तुलसी घाट स्थित गोस्वामी तुलसीदास अखाड़े पर जहां सालभर रौनक रहती थी, वहां भी गिनती के ही लोग बचे। लेकिन भारतीय कुश्ती संघ के संघर्ष के बाद मिट्टी के अखाड़ों को मान्यता मिलने के बाद एक बार फिर अखाड़ों की रौनक लौटने लगी है। संघ ने इन अखाड़ों को गद्दे वाले अखाड़ों के समानांतर चलाने का फैसला किया है। जहां पुराने अखाड़ों में प्रतियोगिताओं के माध्यम से उन्हें पुन: सक्रिय बनाया जा रहा है तो वहीं नए अखाड़े भी बनाए जा रहे हैं। सिगरा स्टेडियम में हालही में नया अखाड़ा बनाया गया। आज भी गया, राम सिंह, तुलसी अखाड़ा के पहलवान अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपनी प्रतिभा का लोहा मनवा रहे हैं।
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