संकट मोचन मंदिर में प्रस्तुति देते निजामी बंधु
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संकट मोचन में अल्लाह तआला और मौला हजरत अली की सुरों से बंदगी कौमी यकजहती के साथ तहजीब का मिसाल बन गई। संकट मोचन के सजदे में पढ़े गए शेर और एक-एक लफ्ज यादगार बन गए। मौका था पहली बार अजमेर शरीफ से आए जाने माने सूफी गायक हमसर हयात निजामी के हाजिरी लगाने का।
निजामी बंधुओं ने भारत माता के जयकारे भी लगाए और कश्मीर पर मुहब्बत का रंग भी चढ़ाया। राम का मंदिर हो या अल्लाह का हो घर/इमारत कोई टूटेगी तो भारत टूट जाएगा...। उन्होंने संकट मोचन की बंदगी के सिलसिले को आगे बढ़ाते हुए राम और कृष्ण पर आधारित शेरों को अपने अंदाज में फरमाकर तालियां बटोरीं।
उनका कहना था कि- इस तरह दुनिया में न नफरत को फैलाया जाए/प्यार-वफा का भी कोई कानून बनाया जाए....। उनकी हर पंक्तियां दिल को छू जाने वाली थीं। जन्नत से जो उतरी है वो तसवीर नहीं देंगे। प्यार देंगे, मगर कश्मीर नहीं देंगे...।
छाप तिलक सब दीनी से मोसे नैना मिलाय के... के बाद दमादम मस्त कलंदर जैसे गीतों पर उन्होंने भोर तक संगीत प्रेमियों को झुमाया। एक ओर जहां राम-हनुमान के बोलों से सजे शब्द थे, वहीं दरगाह शरीफ का नजारा भी देखने को मिला।
इनके बाद सितार वादक नीरज अमरनाथ मिश्र ने राग परमेश्वरी की अवतारणा की। आलापचारी के बाद ताल रूपक और तीनताल में इन्होंने कर्णप्रिय गतकारी की। तबले पर संगत की पं. शुभ महाराज ने।
अंतिम प्रस्तुति में पुणे से आए समीहन कसालकर ने राग मियां की तोड़ी की अवतारणा की। आलापचारी के बाद तीनताल में निबद्ध बंदिश प्रस्तुत की। भजन से समापन किया। तबले पर पं. सुरेश तलवरकर ने हारमोनियम पर मिलिंद कुलकर्णी ने संगत की।