सहायक आचार्य डॉ. राजा पाठक
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संस्कृत धर्म विद्या संस्थान में सहायक आचार्य डॉ. राजा पाठक ने बचपन में कई ठोकरें खाईं पर हिम्मत नहीं हारी। मूलरूप से बिहार निवासी राजा के सिर से पिता का साया ढाई साल की उम्र में ही उठ गया था। मां ने पिता बनकर चार भाई बहनों की पढ़ाई-लिखाई की जिम्मेदारी उठाई। वक्त ऐसा भी आया जब मां कलावती पांडेय को अपने जेवर बेचने पड़े।
12वीं के बाद स्नातक में बीएचयू के संस्कृत विद्या धर्म संस्थान में दाखिला प्राप्त किया। प्रथम आने के बाद 2013 में जेआरएफ में सफलता हासिल की। विदेश में भी शिक्षा का अवसर मिल चुका है। वह दूसरे बच्चों को निशुल्क नेट और जेआरएफ की तैयारी करा रहे हैं। राजा अब तक 800 छात्रों को कोचिंग दे चुके हैं। कई नेट और जेआरएफ क्वालीफाई कर चुके हैं।
बीएचयू में सहायक प्रोफेसर और खगड़िया निवासी डॉ. श्वेता संगीत की दुनिया में पहचान बनाना चाहती थीं। रिश्तेदार खुश नहीं थे, लेकिन पिता सदा शिव प्रसाद जायसवाल ने बेटी के लगन को देखकर ठाना कि वह उसका सपना पूरा करेंगे। गुरुजी को घर बुलाया और बेटी की शिक्षा-दीक्षा शुरू हुई। घड़ी बनाकर जो भी कमाते शिक्षा के लिए रख देते थे।
श्वेता ने 12 साल में पहला स्टेज शो किया। पिता ने बेटी का प्रवेश भागलपुर विश्वविद्यालय में कराया। स्नातक पूरा करने के बाद आगे की शिक्षा के लिए बनारस भेजा। रिश्तेदारों ने शादी का दबाव बनाया, लेकिन पिता ने बेटी के सपनों को तवज्जो दी। श्वेता का दाखिला बीएचयू एम म्यूज में प्रवेश हो गया। उन्होंने नेट क्वालीफाई किया और पीएचडी के बाद एमएमवी में संगीत विभाग में सहायक प्रोफेसर की नौकरी मिल गई। श्वेता कहती हैं कि गुरु राम शंकर सिंह का उनकी सफलता में काफी योगदान रहा।
कैंची में धार देकर बेटी को बनाया फुटबॉलर
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कैंची में धार देने का काम करने वाले पहाड़ी गांव के नरेश शर्मा ने दो बोटियों को खेल के क्षेत्र में आग बढ़ाया। एक बेटी अमृता शर्मा राष्ट्रीय प्रतियोगिता में यूपी टीम की ओर से गुवाहाटी में खेल रही है। तीन में से दो बेटी फुटबाल खेलती हैं। इनकी प्रतिभा को देख खेलने के लिए प्रेरित किया। नरेश ने कहा कि कैंची में धार लगाकर बेटियों के सपने पूरे कर रहे।
वह जब बाहर खेलने जाती हैं तो गर्व होता है। बेटी का राष्ट्रीय प्रतियोगिता में खेलना ही पिता दिवस का उपहार है। अमृता ने बताया कि पिता पढ़ाई लिखाई के साथ खेल के लिए भी हमेशा प्रेरित करते हैं। राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में खेलकर पिता को उपहार दे सकूं, आगे भी यही प्रयास होगा।
आराजीलाइन के बाबूराम पूरा पनियारा गांव की ज्ञांति मिश्रा ने 20 साल पहले पति लल्लन के निधन के बाद कड़ी मेहनत करबेटे को अधिकारी बनाया। छोटे छोटे बच्चों को लेकर खेती की। इस आमदनी से घर का खर्च और बच्चों की पढ़ाई हुई। गोरखपुर में सेल टैक्स विभाग में तैनात पति के अरमान को पूरा करने के लिए ज्ञांति बच्चों को प्रेरित करती रहीं। स्नातक की पढ़ाई के बाद बेटे विपिन कुमार ने लेखपाल की परीक्षा पास की। इसके बाद पीसीएस परीक्षा दी। जिसे पास कर पिता की तरह सेल टैक्स विभाग में नौकरी हासिल कर ली।