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25 दिन 25 कहानियां: मुन्ना से मुख्तार तक... कचहरी के गलियारों में गुजरा काशी का एक दौर

Sat, 16 May 2026 02:35 PM IST
Pragati Chand अमर उजाला नेटवर्क, वाराणसी।

सार

एडवोकेट मंगलेश दुबे ने कहा कि पहले कचहरी में बड़े माफियाओं की पेशी होती थी तो सुरक्षा के कड़े इंतजाम होते थे। उस दौर में हाथ के टाइपराइटर की खट-खट अब कंप्यूटर कीबोर्ड में बदल चुकी है।
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एडवोकेट मंगलेश दुबे - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
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एक दौर था जब बनारस कचहरी का मतलब सिर्फ तारीख, बहस और फैसला नहीं होता था। बड़े माफियाओं की पेशी के दिन पूरा परिसर छावनी में तब्दील हो जाता था। मुन्ना बजरंगी, मुख्तार अंसारी, बृजेश सिंह, धनंजय सिंह, सुभाष ठाकुर और अभय सिंह जैसे नामों के केस यहीं सुने गए। हाथ के टाइपराइटर की खट-खट अब कंप्यूटर कीबोर्ड में बदल चुकी है। गुरु-शिष्य परंपरा कमजोर हुई है। शहर की रफ्तार बदल गई, अपराध का चेहरा बदल गया, वकालत का तरीका बदल गया लेकिन कचहरी अब भी वही है। थोड़ी थकी हुई, थोड़ी भीड़भाड़ वाली, थोड़ी अव्यवस्थित, मगर अपने भीतर शहर का असली चरित्र संभाले हुए...।

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काशी की कचहरी सिर्फ मुकदमों का अड्डा नहीं रही। यह शहर के बदलते सामाजिक, राजनीतिक और आपराधिक इतिहास की जीवित डायरी भी है। पिछले 25-30 वर्षों में इस परिसर ने बहुत कुछ बदलते देखा है। टाइपराइटर से कंप्यूटर तक, खपरैल के छाजन से टिनशेड तक और अदालत की पुरानी तहजीब से नए दौर की तेज रफ्तार वकालत तक। एक दौर था जब बनारस कचहरी का मतलब सिर्फ तारीख, बहस और फैसला नहीं होता था। 

बड़े माफियाओं की पेशी के दिन पूरा परिसर छावनी में तब्दील हो जाता था। पुलिस, पीएसी, बैरिकेडिंग और हर तरफ चौकसी। मुन्ना बजरंगी, मुख्तार अंसारी, बृजेश सिंह, धनंजय सिंह, सुभाष ठाकुर और अभय सिंह जैसे नामों के केस यहीं सुने गए। पेशी के दिन अदालत परिसर में अलग तरह की खामोशी होती थी, जिसमें भीड़ भी धीरे चलती थी और फुसफुसाहटें भी खबर बन जाती थीं।
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इसी कचहरी ने चर्चित डायना हत्याकांड भी देखा। न्यूजीलैंड के एक बड़े कारोबारी की बेटी डायना बनारस घूमने आई थी, लेकिन उसकी रिक्शा चालक ने हत्या कर दी थी। इस हत्या ने शहर को झकझोर दिया। मामले की सुनवाई और दोषियों को उम्रकैद की सजा ने इस अदालत को राष्ट्रीय सुर्खियों में ला दिया था।

एक समय ऐसा भी आया जब उच्च न्यायालय ने बनारस की सत्र अदालत को समाप्त कर मिर्जापुर ट्रांसफर करने का फैसला कर दिया। यह सिर्फ प्रशासनिक निर्णय नहीं था, बल्कि बनारस की न्यायिक पहचान पर चोट जैसा माना गया। दोनों जिलों के वकील सड़क पर उतर आए। जबरदस्त विरोध हुआ और आखिरकार फैसला वापस लेना पड़ा। उस दौर को याद करने वाले अधिवक्ता आज भी कहते हैं कि कचहरी बचाने की भी लड़ाई लड़ी गई थी।

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90 के दशक तक अदालतों की भाषा भी अलग थी। जज के सामने अधिवक्ताओं के मुंह से निकलता था हुजूर इंसाफ की गुहार है, मुल्जिम बेकसूर है जनाब, अदालत से रहम की अपील है। इन शब्दों में पेशे की तहजीब, नाटकीयता और एक किस्म का अदब था। अब अदालतों में हिंदी और अंग्रेजी का मिला-जुला व्यावहारिक शब्दकोश ज्यादा सुनाई देता है। लेकिन, सबसे बड़ा बदलाव भौतिक ढांचे और पेशे की संस्कृति में आया। 25 साल पहले परिसर ज्यादा खुला, साफ-सुथरा और अपेक्षाकृत शांत था। 

अब अधिवक्ताओं की संख्या कई गुना बढ़ चुकी है। बार एसोसिएशन का आकार बड़ा हुआ, न्यायालय भवन बढ़े लेकिन बैठने की जगहें अब भी संघर्ष की कहानी कहती हैं। खपरैल के नीचे बैठने वाले वकील निजी प्रयासों से टीनशेड तक पहुंचे। पक्के चैंबर आज भी सीमित हैं। गर्मी और बरसात अब भी टिनशेड और पुराने पंखों के भरोसे कटती है। चाय, पकौड़ी और उधारी वाले जलपान गृह आज भी कचहरी की संस्कृति का हिस्सा हैं। बाहर भले वातानुकूलित रेस्टोरेंट खुल गए हों, लेकिन अधिकतर अधिवक्ता आज भी उन्हीं पुराने ठिहों पर मिल जाते हैं, जहां बहस कानून से ज्यादा राजनीति और शहर पर होती है।

हाथ के टाइपराइटर की खट-खट अब कंप्यूटर कीबोर्ड में बदल चुकी है, लेकिन काम का दबाव पहले से ज्यादा है। जूनियर अधिवक्ताओं की नई पीढ़ी ज्यादा आत्मनिर्भर और तकनीकी रूप से सक्षम है। गुरु-शिष्य परंपरा कमजोर हुई है, लेकिन प्रतिस्पर्धा बढ़ी है। बनारस बदल गया, शहर की रफ्तार बदल गई, अपराध का चेहरा बदला, वकालत का तरीका बदला लेकिन कचहरी अब भी वही है। थोड़ी थकी हुई, थोड़ी भीड़भाड़ वाली, थोड़ी अव्यवस्थित, मगर अपने भीतर शहर का असली चरित्र संभाले हुए। -एडवोकेट मंगलेश दुबे, पूर्व अध्यक्ष, सेंट्रल बार एसोसिएशन
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