आपने अक्सर सुना होगा कि परिश्रम और संघर्ष सफलता की चाबी है। काशी की एक बेटी पर ये कहावत सटीक बैठती है। वो हैं एसिड अटैक सर्वाइवर मंगला कपूर। 11 साल की उम्र में एसिड अटैक होने के बाद उन्होंने दर्द झेला, लेकिन अपने लक्ष्य को धूमिल नहीं होने दिया। उन्होंने इस घटना को एक चुनौती की तरह लिया और आज वे कई महिलाओं के लिए प्रेरणा बन गई हैं। आज हम उनकी संघर्ष की कहानी सेे रूबरू होंगे।
कभी परिवार की रंजिश में 11 साल की इस बेटी को एसिड अटैक का सामना करना पड़ गया। तीन भाइयों के बीच इकलौती बहन के लिए ये हादसा इतना भयानक था कि इसके बाद उन्होंने अपना चेहरा ही खो दिया। एसिड से खराब हुए चेहरे को ठीक कराने के लिए अलग-अलग शहरों में उन्हें 37 ऑपरेशन करवाने पड़े। इस बीच 2007 में एक एक्सीडेंट के दौरान उनकी जांघ की दोनों हड्डियां भी टूट गईं। लेकिन अपने मजबूत मनोबल और जुझारू होने के कारण उन्होंने वापसी की। एसिड अटैक के मानसिक, शारीरिक और भावनात्मक तूफान से बाहर निकलने के लिए मंगला के पिताजी उनका सहारा बने। मंगला की सर्जरी ने परिवार को आर्थिक रूप से भी खोखला कर दिया। अपने चेहरे की वजह से उन्हें स्कूल और कॉलेज ही नहीं नौकरी मिलने में भी परेशानी झेलनी पड़ी। लेकिन उन्होंने हिम्मत नहीं हारी।
मंगला ने बीएचयू से बी. म्यूज, एम म्यूज में गोल्ड मेडल और पीएचडी हासिल की। जब मंगला गातीं हैं तो उनकी मीठी आवाज सुनने के लिए लोगों की भीड़ लग जाती थी। पीएचडी करने के बाद बीएचयू के महिला महाविद्यालय में लेक्चरर की पोस्ट पर उनकी नियुक्त हुई। आज उनके मार्गदर्शन में 13 विद्यार्थियों ने अपनी पीएचडी की पढ़ाई पूरी कर चुके हैं।
काशी की लता का मिल चुका है सम्मान
प्रो. मंगला कपूर को काशी की लता मंगेशकर सम्मान दिया जा चुका है। हाल ही में राज्य सभा द्वारा उन्हें रोल मॉडल पुरस्कार भी दिया गया है।