वाराणसी। यदि सब कुछ ठीक-ठाक रहा तो एक साल बाद यूनेस्को की वर्ल्ड हेरिटेज सिटी की सूची में काशी को भी स्थान मिल सकता है। बीएचयू में सेमिनार में हिस्सा लेने आईं यूनेस्को की सेक्शन चीफ एंड प्रोग्राम स्पेशलिस्ट फार कल्चर मोए छिबा से इस संबंध में बातचीत होने के बाद महापौर रामगोपाल मोहले ने इसकी पुष्टि की है।
काशी को वर्ल्ड हेरिटेज सिटी की सूची में शामिल करने के लिए संस्कृति मंत्रालय और यूनेस्को के निदेशक से महापौर ने बीते दिनों पत्राचार किया था। साथ ही, समूचे मामले से प्रधानमंत्री कार्यालय को भी अवगत कराया था। इसी के आधार पर बीएचयू आईं मोए छिबा ने महापौर से 30 नवंबर को मुलाकात की। महापौर के सलाहकार राजकुमार अग्रवाल ने बताया कि हेरिटेज सिटी की सूची में शामिल होने की प्रक्रिया के पहले चरण में यूनेस्कोे की अस्थायी सूची में काशी को जगह दी जाएगी। इस दौरान एक साल तक यूनेस्को यह परखेगा कि काशी का स्थानीय प्रशासन और यहां के लोग अपनी धरोहरों के संरक्षण के प्रति कितने गंभीर हैं। संरक्षण के लिए स्थानीय नियम कानून और प्रयास क्या हैं। इसके बाद दूसरे और अंतिम चरण में हेरिटेज सूची में स्थायी रूप से जगह मिल सकेगी। मोए छिबा ने आश्वस्त किया कि नई दिल्ली पहुंचते ही इस संबंध में सारी औपचारिकताओं को पूरा करने के लिए वे कागजात और प्रक्रिया का विवरण जल्द भेजेंगी।
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क्या है वर्ल्ड हेरिटेज सिटी
संयुक्त राष्ट्र शैक्षिक, वैज्ञानिक एवं सांस्कृतिक संगठन (यूनेस्को) संयुक्त राष्ट्रसंघ का एक अंग है। यूनेस्को वैश्विक स्तर पर शिक्षा, प्राकृतिक, सामाजिक एवं विज्ञान, संस्कृत और ऐतिहासिक धरोहरों के संरक्षण में सहयोग करता है। इसी के तहत धर्म, कला, संस्कृति, वन क्षेत्र, पर्वत, झील, स्मारकों और प्राचीन भवनों को सहेज कर रखने वाले दुनिया के पुराने शहरों का चयन विश्व विरासत स्थल समिति करती है। इन शहरों को आर्थिक, तकनीकी और वैचारिक स्तर पर मदद देकर यूनेस्को वहां की धरोहरों के संरक्षण में अहम भूमिका निभाता है।
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क्या होगा फायदा
- वैश्विक स्तर पर काशी का प्रचार प्रसार यूनेस्को करेगा। महत्व व पहचान को और मजबूती मिलेगी।
- यूनेस्को की वेबसाइट पर नाम दर्ज होने से काशी विदेशी सैलानियों के आकर्षण का केंद्र बनेगी।
- काशी की ऐतिहासिक धरोहरें बेहतर तरीके से लंबे समय के लिए संरक्षित हो सकेंगी।
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2002 में भी हुई थी कवायद
वर्ल्ड हेरिटेज सिटी की सूची में काशी को शामिल करने के लिए वर्ष 2002 में भी कवायद की गई थी। इस दौरान अस्सी घाट से राजघाट के बीच ऐतिहासिक व पुरातात्विक महत्व की 71 धरोहरों और सारनाथ के सभी प्रमुख स्थलाें को चिह्नित किया गया था। यह प्रस्ताव तत्कालीन केंद्र व राज्य सरकार दोनों को भेजा गया था। इसके बाद 2003 और 2007 में भी कोशिशें हुईं लेकिन सफलता नहीं मिली। महापौर ने बताया कि पूर्व में स्थानीय प्रशासन द्वारा सही तरीके से प्रयास नहीं किया गया और केंद्र स्तर पर भी रुचि नहीं ली गई। लेकिन इस बार पूरी तैयारी के साथ प्रयास किया जा रहा है। प्रधानमंत्री का संसदीय क्षेत्र होने के कारण संस्कृति मंत्रालय भी भरपूर सहयोग कर रहा है।