वाराणसी। जूट के गहने हों या फैंसी चप्पलें कामकाजी महिलाओं और कॉलेज गोइंग युवितयों को खूब भा रही हैं। पढ़ी-लिखी महिलाएं जूट की बालियां और झुमके ज्यादा पसंद कर रही हैं। लब्बोलुआब यह कि जूट के फैंसी उत्पाद फैशन की दुनिया को नया कलेवर दे रहे हैं। सोनारपुरा के सनातन गौडि़या मठ परिसर में 19 सितंबर से चल रहे सात दिनी जूट मेले में खरीदारी तो यही इशारा कर रही है। जूट बोर्ड के आंकड़े बताते हैं कि यूरोप में बढ़ी मांग के चलते वर्ष 2013-14 में जूट का निर्यात दो हजार करोड़ तक पहुंच गया।
जूट मेले में कोलकाता से आए निर्यातक और कारीगर इस उद्योग में आर्डर की बढ़ती होड़ से उत्साहित नजर आए। मेले में सबसे अधिक भीड़ गहने, लेडीज बैग और फैंसी जूतियों के स्टाल पर लग रही है। जूट से बनी चूडि़यों की लड़कियों में अधिक डिमांड है। हेयर क्लिप, ईयर रिंग, हार और ब्रेसलेट बालाओं को खूब लुभा रहे हैं। कोलकाता के बेलघडि़या से आए कारीगर ए. सरकार ने बताया कि आर्डर इतने ज्यादा हैं कि आपूर्ति नहीं हो पा रही है। दिल्ली, अहमदाबाद, हैदराबाद, मुंबई जैसे शहरों में जूट के फैंसी गहने खूब पसंद किए जा रहे हैं। मेले का प्रबंधन देख रहे जूट बोर्ड के सेल्स प्रमोटर एसबी शर्मा ने बताया कि यूएसए, कनाडा, आस्ट्रेलिया, ब्रिटेन, सउदी अरब, जर्मनी और बेल्जियम आदि देशों में जूट से उत्पादों की मांग बढ़ी है। वर्ष 2013-14 में यूरोपीय देशों में जूट का निर्यात बढ़कर दो हजार करोड़ रुपये तक पहुंच गया। जूट की चूडि़यों, गिफ्ट आइटम, कपड़ों और सजावटी सामानों का 483 करोड़ रुपये का निर्यात हुआ।
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काशी में कारोबार ने किया निराश
वाराणसी। अलग-अलग राज्यों और दूसरे देशों से आर्डर तो बहुत मिल रहे हैं लेकिन इस बार काशी के मेले में हुए कारोबार से हम बहुत खुश नहीं हैं। यह कहना है कोलकाता से स्टाल लगाने आए लालटू पोद्दार का। उनका कहना है कि पिछली बार पांच दिन में जूतियों और चप्पलों के कारोबार में जहां 95 हजार रुपये का मुनाफा हुआ था, वहीं इस बार सिर्फ छह हजार रुपये की बिक्री हुई है। इसकी मुख्य वजह मेले का प्रचार-प्रसार न होना है।