वाराणसी। काशी के तुलसीघाट स्थित अपनी बैठक के कोटर से गंगा को अपलक निहारते हुए प्रतिष्ठित संकटमोचन मंदिर के महंत व बीएचयू में इंजीनियरिंग के प्रोफेसर विश्वंभरनाथ मिश्र कहते हैं कि विरासत में मिली उनकी चिंता कब खत्म होगी, कह नहीं सकते क्योंकि गंगा की सफाई के नाम पर अब तक तकरीबन 20 हजार करोड़ खर्च हो गए हैं पर वह साफ होने के बजाय और मैली हो गई है। अपनी बात को तार्किक आधार देने के लिए वह आंकड़ों की जुगाली करने से भी चूकते नहीं। संकटमोचन फाउंडेशन द्वारा मापे गए प्रदूषण के आधार पर बताते हैं, 1992 में बनारस के गंगा जल में बीओडी (बायोलाजिकल आक्सीडन डिमांड) 5 मिलीग्राम प्रति लीटर थी, जो 2014 में बढ़कर 7.2 और जिस फिकल कोलीफार्म की संख्या 10,000 प्रति मिलीलीटर थी वह बढ़कर 41,000 हो गई।
प्रोफेसर मिश्र की चिंता बेमानी नहीं है क्योंकि मोक्षदायिनी कही जाने वाली गंगा का पानी लाख सरकारी प्रयासों के बावजूद बनारस सहित अनेक स्थानों पर न स्नान लायक रह गया और न आचमन केे। हालांकि इस बढ़ते प्रदूषण को लेकर पिछले 30 सालों से चिंता जताई जा रही है, हजारों करोड़ रुपये भी खर्च हुए पर उसका कोई प्रभाव गंगा पर नहीं दिखा। वह जस की तस मैली ही नहीं रही, बल्कि और प्रदूषित हो गई। जानकार कहते हैं कि पैसा खर्च हुआ पर समस्या के मूल में जाने की कोशिश नहीं हुई। गंगा को साफ करने की पालिसी व प्लानिंग दोनों ठीक नहीं थी। निर्मलीकरण के नाम पर उसकी गंदगी के निस्तारण पर ध्यान दिया गया जबकि निर्मलीकरण का सीधा रिश्ता गंगा की अविरलता से है। कई दशकों से गंगा के सवाल पर आंदोलित बीएचयू के पूर्व प्रोफेसर यूके चौधरी कहते हैं कि गंगा की अविरलता पर तो ग्रहण तब ही लग गया था जब अंग्रेजों ने गंगा पर भीमगौड़ा बांध बना दिया था। अफसोस की बात है कि आजाद हिन्दुस्तान में भी गंगा पर बांध बनाने का सिलसिला जारी रहा। इस बात पर गंभीरता से विचार ही नहीं किया गया कि बांध बनने से गंगा का क्या नुकसान होगा। वह तर्क देते हैं कि अविरलता के बिना गंगा में निर्मलता नहीं आएगी और उसके लिए बांधों को तोड़ना ही होगा। सवाल उठता है कि क्या बिना किसी दूरगामी योजना के 20 हजार करोड़ निर्मलीकरण के नाम पर खर्च कर दिए गए।
प्रधानमंत्री की अध्यक्षता वाले राष्ट्रीय गंगा नदी बेसिन प्राधिकरण के सदस्य प्रो. बीडी त्रिपाठी बताते हैं कि गंगा एक्शन प्लान, जेएनएनयूआरएम, जायका व विश्वबैंक द्वारा तकरीबन 20 हजार करोड़ की लागत से विभिन्न योजनाएं अमल में लाई गईं। पर आपस में तालमेल न होने के कारण कामों का डुप्लीकेशन भी हुआ। पालिसी व प्लानिंग भी ठीक नहीं थी। चूंकि योजनाएं सरकार की प्राथमिकताओं में नहीं थी, इसलिए उनकी मानीटरिंग भी नहीं हुई। गंगा को लेकर सरकार की गंभीरता को इस बात से भी समझा जा सकता है कि गंगा नदी बेसिन प्राधिकरण की चार साल में मात्र तीन बैठकें हुईं। त्रिपाठी कहते हैं कि नरेंद्र मोदी ने जिस तरह अपने चुनाव में गंगा को राजनीतिक मुद्दा बनाने की कोशिश की, उससे लगता है कि वह पतित पावनी सलिला के उद्धार की कोई कारगर पहल करेंगे।
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काशी में कितनी गंदी होती है गंगा
अपने ही एक अध्ययन का हवाला देते हुए राष्ट्रीय गंगा नदी बेसिन प्राधिकरण के सदस्य प्रो. बीडी त्रिपाठी बताते हैं कि बनारस में 33 नालों के जरिए तकरीबन 350 एमएलडी सीवेज व कचरा गंगा नदी में प्रवाहित होता है। इसके अलावा मणिकर्णिका व हरिश्चंद्र घाट पर साल भर में 33 हजार शव जलाए जाते हैं, जिनसे 800 टन राख निकलती है। यह राख गंगा में ही जाती है। इसके अलावा शवों का 300 टन अधजला मांस, 3056 बच्चों व आदमियों के शव तथा 6000 जानवरों की लाशें गंगा में जाती हैं।
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पालिसी व प्लानिंंग बदलें
भागीरथी, अलखनंदा, मंदाकिनी में बने 50 से अधिक बांधों और भीमगौड़ा व नरोरा बैराज से गंगा की अविरलता काफी प्रभावित हुई है। इन बांधों को तोड़ा न जाए पर गंगा पर भविष्य में बांधों के बनने पर रोक लगनी चाहिए। रेन वाटर हार्वेस्टिंग व ग्राउंडवाटर रिचार्जिग बढ़ाकर राज्यों को पानी के मामले में आत्मनिर्भर होना पड़ेगा। उद्योगों का पानी सीवर लाइन में डालने पर प्रतिबंध लगे। गंगा को लेकर पालिसी व प्लानिंग में परिवर्तन होना चाहिए। आने वाली सरकार ने जिस तरह गंगा को राजनीतिक मुद्दा बनाया है, मुझे लगता है कि निर्मलीकरण के लिए कोई कारगर पहल अवश्य होगी। - प्रोफेसर बीडी त्रिपाठी, सदस्य, राष्ट्रीय गंगा नदी बेसिन प्राधिकरण
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भीमगौड़ा व नरौरा को तोड़े बिना निर्मलीकरण संभव ही नहीं
भीमगौड़ा व नरौरा बांध को तोड़े बिना गंगा के निर्मलीकरण की कल्पना ही नहीं की जा सकती। इनको तोड़े बिना गंगा में मौलिक आवेग नहीं आएगा। मेरा मानना है कि नरौरा के आगे गंगा तनिक भी ओरिजिनल नहीं रह जाती। बनारस आते आते इसमें गोमुख से निकले पानी की एक बूंद भी नहीं रहती। इसके अलावा कानपुर में टैनरियों से निकलने वाले प्रदूषित जल को गंगा में जाने से पूरी तौर से रोका जाए। बनारस में जो सीवेज के नाले गंगा में गिरते हैं, उनको रोककर सैंडक्षेत्र में एसटीपी बनाए जाए। तब कहीं गंगा में प्रदूषण को थोड़ा बहुत कम किया जा सकता है। काम बेहद जटिल और चुनौतीपूर्ण है। - प्रोफेसर यूके चौधरी, बीएचयू की गंगा प्रयोगशाला के पूर्व निदेशक
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गंगा: एक विहंगम दृष्टि
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लंबाई---करीब 2525 किलोमीटर
कहां से कहां तक---गोमुख से बंगाल की खाड़ी तक
रास्ते में पड़ने वाले प्रमुख शहर---ऋषिकेश, हरिद्वार, रुढ़की (उत्तराखंड), कन्नौज, कानपुर, इलाहाबाद, बनारस, मिर्जापुर (यूपी), पटना, भागलपुर (बिहार), बहरामपुर, हाबड़ा, कोलकता (पश्चिम बंगाल)।
:-गंगा एक्शन प्लान-प्रथम चरण--1986 में प्रारंभ हुआ और मार्च 2000 में समाप्त।
पैसा खर्च--462 करोड़।
:-दूसरा चरण-1993 में प्रारंभ
पैसा अनुमोदित--2285.48 करोड़।
:- गंगा बेसिन का एरिया-करीब 16 लाख वर्ग किलोमीटर
:--गंगा बेसिन का कैचमेंट एरिया--861404 वर्ग किलोमीटर
:--गंगा को राष्ट्रीय नदी का दर्जा मिला--2009 में।
:-गंगा की सफाई में अब तक तकरीबन 20 हजार करोड़ खर्च ( गंगा एक्शन प्लान, ग्राम्य विकास मंत्रालय, जेएनएनयूआरएम, जायका व विश्वबैंक)
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