वाराणसी। तालाबों, गड्ढों में पैदा होने वाले नरकट को तराशकर बनाया गया पुत्तुर जब काठ की पाइप में लग जाता तो साज बन जाता है। इस साज को शहनाई कहते हैं। शहनाई बजाने वाले पहले भी बहुत थे और आज भी हैं लेकिन उनके स्वरों में भारतरत्न उस्ताद बिस्मिल्लाह खां जैसी कशिश कहां..? उस्ताद की सातवीं बरसी पर पीर के बुध के रोज दरगाह-ए-फातमान स्थित उनकी कब्र पर खिराजे अकीदत पेश करने आया हर शख्स इस सवाल का जवाब ढूंढता रहा। शहनाई की फिक्र हर किसी को थी लेकिन अबकी मजार पर स्वर सुनाई नहीं दिए।
उस्ताद की कच्ची कब्र को गुलाब की पंखुडि़यों से सजाया गया। कुरानख्वानी की गई। फातिहा पढ़ा गया। कांग्रेस के राष्ट्रीय सचिव व प्रदेश के सहप्रभारी राणा गोस्वामी, कांग्रेस के ही वाराणसी जोन के प्रभारी दिग्विजय सिंह, विधायक अजय राय, दयाशंकर मिश्र दयालू, सितारवादक देवव्रत मिश्र, आईजी जीएल मीणा, एसएसपी अजय मिश्रा, फरमान हैदर, शैलेंद्र सिंह के अलावा उस्ताद के करीबी और परिवार के सदस्यों ने खिराजे अकीदत पेश की। इसके अलावा न ज्यादा कलाकार आए और न शहर के अन्य गणमान्य लोग। उस्ताद के निजी सचिव रहे एस. जावेद अहमद हों या उस्ताद के बड़े बेटे माहताब हुसैन, बेटी जरीना बेगम, अब्बास मुर्तजा शम्सी, अब्बा सिराजी सबके पास सुनाने को संस्मरण बहुत थे। किसी ने मास्को के उस वाकये को सुनाया जब सोवियत संघ के राष्ट्रपति मिखाइल गोर्वाचोव खुद मिलने आए और जब उस्ताद का परिचय उनसे कराया गया तो उन्होंने हिंदी में कहा, आपसे मिलकर बहुत खुशी हुई।
किसी ने कहा कि रेलवे स्टेशनों पर शहनाई की धुनें बजाई जानी थी। केंद्र सरकार अपना यह वादा भूल गई। राज्य सरकार ने भी वादे नहीं निभाए। उस्ताद सुरों की दुनिया में जीते थे, उनको कोई बेसुरी बात पसंद नहीं थी। उनके सिरहाने अबकी राग-रागिनी की बातें नहीं हुईं। उनके शहनाई वादक पुत्र जामिन हुसैन इस पर चुप रहे। अलबत्ता उनके छोटे बेटे तबला वादक नाजिम हुसैन ने इतना जरूर कहा कि मजार पक्की बने न बने, शहनाई अकादमी खुले न खुले लेकिन शहनाई के स्वरों को जिंदा रखना होगा। उस्ताद के मुरीद इंफ्रास्ट्रक्टर कंसल्टेंट नरेंद्र गुप्ता ने कहा कि शहनाई बहुत लोग बजा रहे हैं लेकिन सब बाजा बजाते हैं, उस्ताद शहनाई के जरिये दिल का राग सुनाते थे। नरेंद्र हर साल मजार पर सुंदरकांड और हनुमान चालीसा का पाठ करने आते हैं।