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ढाई फीट के गड्ढे में फंसी ‘नमामि गंगे’

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ज्ञानपुर/लालानगर। डीघ ब्लॉक के गुलौरी गांव निवासी लालमणि पाल का शौचालय सरकारी मदद से बनाया गया। महज ढाई फीट का सोख्ता गड्ढा खोदकर शौचालय तो बना दिया गया, लेकिन यह घर के केवल एक बुजुर्ग के उपयोग के लिए छोड़ दिया गया है। घर के अन्य सदस्य सोख्ता जल्द भर जाने की चिंता से शौच के लिए बाहर जाते हैं। गुलबा देवी के शौचालय में सोख्ता ही नहीं है। लिहाजा शौचालय बेकार और घरवालों को सिवान में जाना पड़ता है। अमिलौर गांव के रामपुर घाट निवासी राजितराम निषाद के घर के सामने दीवारे खड़ी कर दी गईं लेकिन न छत बनी और न दरवाजे लगे। गड्डा भी नहीं खोदा गया। अमर उजाला ने मंगलवार को शौचालयों की स्थलीय पड़ताल की तो ओडीएफ घोषित गांवों की स्याह हकीकत सामने आई।
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नमामि गंगे योजना के तहत करोड़ों रुपये की लागत से ओडीएफ घोषित गांवों की सच्चाई चौंकाने वाली है। महज ढाई से तीन फीट गहरे सोख्ते के दम पर गांवों को खुले में शौच से मुक्त करने के फेर में यह योजना जिले में औंधे मुंह गिर पड़ी है। ज्यादातर गांवों में शौचालय निर्माण का कार्य पूरा नहीं हो सका है। गंगावर्ती गांवों में बेहद बुरा हाल है। ज्यादातर शौचालय या तो बने नहीं, या बनने के बाद भी उपयोग में नहीं लिए जा रहे हैं। लिहाजा गांवों को खुले में शौच से मुक्त करने की मंशा यहां पूरी तरह फेल होती दिख रही है।
मोदी सरकार के स्वच्छता मिशन को धार देने के लिए नमामि गंगे योजना के तहत गंगा किनारे के गांवों को ओडीएफ बनाने का लक्ष्य रखा गया था। मोदी सरकार बनने के बाद 2016 में गांवों को ओडीएफ बनाने का काम शुरू हुआ। इसके लिए डीघ ब्लॉक के 34 और औराई ब्लॉक के 13 गांवों को मिलाकर कुल 47 गांवों को चुना गया। प्रत्येक गांव में औसतन 500 शौचालय निर्माण के लिए 12 हजार रुपये प्रति शौचालय की दर से कुल लगभग 30 करोड़ की धनराशि जारी की गई। शौचालय की धनराशि लाभार्थियों के खाते में भेज दी गई, लेकिन धरातल पर जल्द ही शौचालय निर्माण की हवा निकलती दिखने लगी। बनने के बाद भी ज्यादातर शौचालय अनुपयोगी साबित हो रहे हैं। किसी में दरवाजा नहीं है तो कोई बिना सोख्ते के किसी काम का नहीं है।
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