वाराणसी। मौनी अमावस्या पर मंगलवार को गंगा स्नान के लिए घाटों पर भक्तों की भीड़ उमड़ी। गंगा नदी में डुबकी लगाने के बाद भक्तों ने तिल का दान किया। भक्तों की भीड़ सुबह से लेकर दोपहर दो बजे तक घाटों पर रही। भक्तों ने सूर्य की उपासना के साथ भगवान विष्णु की पूजा-अर्चना की।
काशी के विभिन्न गंगा घाटों पर भारी संख्या में श्रद्धालुओं ने पतित पावनी में डुबकी लगाई। इस बारे में घाट के पुजारी रामजतन ने बताया कि मौनी अमावस्या के दिन स्नान, दान, जप और होम किया जाता है। इससे पूरे माघ माह का शुभ फल प्राप्त होता है। आज के दिन स्नान के बाद दान का भी विधान है। इस दिन तिल का दान करना चाहिए। इससे यश में वृद्धि होती है। मौन रहने से मन और गंगा स्नान से तन, दान करने से धन की शुद्धि होती है। काशी में वैसे तो स्नान, दान का अपना अलग ही महात्म्य है। पुण्यकाल में मोक्ष दायिनी गंगा में डुबकी लगाने से जन्म जन्मांतर के पापों से मुक्ति मिलती है। ऐसी प्राचीन मान्यता है। अमावस्या वैसे तो हर महीने में दो बार पड़ती है लेकिन माघ मास की अमावस्या का अपना एक अलग ही महात्म्य है। इस दिन बनारस के घाटों पर मां गंगा में डुबकी लगाने के लिए विभिन्न स्थानों से श्रद्धालु आए। मौनी अमावस्या का पावन पर्व पौराणिक काल काल से ही चला आ रहा है।
मौनी अमावस्या यानी भगवान ब्रह्मा के स्वयंभू पुत्र ऋषि मनु के जन्म का दिन। इस दिन को मौनी अमावस्या के नाम से जाना जाता है। ऋषि मनु ने आजीवन मौन रहकर तपस्या की थी इसलिए आज की तिथि को मौनी अमावस्या कहा जाता है। इस पावन पर्व का वर्णन गोस्वामी तुलसी दास ने भी रामचरित मानस में किया है। मान्यता है की मौनी अमावस्या के दिन मौन रहकर सूर्य उदय से पहले जब आकाश में लालिमा हो तो संकल्प लेना चाहिए। इस दौरान पावन तीर्थों में स्नान करने से हर मनोकामना की पूर्ति होती है