वाराणसी। नदी के बहाव क्षेत्र में बाधक बनने वालों पर कार्रवाई का नियम है। बावजूद इसके वरुणा नदी के डूब क्षेत्र में कब्जा करके निर्माण कराने वालों पर एक साल बाद भी कार्रवाई नहीं हो पाई है। इसके लिए सरकारी व्यवस्था जिम्मेदार हैं। एक विभाग जिस काम को अवैध मानकर कार्रवाई करता है, दूसरा विभाग नियमों की आड़ में या फिर लेन-देन कर उसे वैध कर देता है।
वरुणा के डूब क्षेत्र में अवैध कब्जा करने पर सिंचाई विभाग ने अप्रैल 2016 में उत्तरी भारत कैनाल एवं ड्रेनेज एक्ट 1873 की धारा 70 के तहत 130 लोगों को नोटिस दिए थे। नोटिस पाने वालों में होटल कारोबारी, व्यावसायिक प्रतिष्ठान और भवन स्वामी थे। नोटिस के जवाब में इन सभी ने जमीन क्रय करने के दस्तावेज, नगर निगम से जारी पीला कार्ड, मकान नंबर की रसीद, वीडीए से नक्शा पास होने के दस्तावेज और राजस्व रिकार्ड की खतौनी में दर्ज अपने नाम के कागजात जमा कर दिए गए। नोटिस का जवाब मिलने के बाद सिंचाई विभाग ने इसकी पूरी जानकारी प्रशासन को सौंप दी थी।
अधिकारियों की मानें तो जिस एक्ट के तहत कार्रवाई की गई थी, उसमें नदी के बहाव क्षेत्र में बाधक बनने के आधार पर नोटिस जारी किया गया था। जिस जगह को लेकर यह शंका थी कि जमीन कब्जा की गई है और उसका वैध कागज मालिक ने दिखा दिया तो दंड का प्रावधान ही नहीं है। इस कारण किसी पर दंड नहीं लगाया गया।
पूर्व के प्रशासनिक अधिकारियों का मानना है कि आबादी बढ़ने पर सरकारी जमीनों पर कब्जे शुरु हो गए थे। इन कब्जाें को वैध करने में नगर निगम, राजस्व और वीडीए की अहम भूमिका रही है। यही कारण है कि कई जमीनों से कब्जा हटाने में प्रशासनिक मशीनरी आए दिन फेल हो जाती है और नोटिस की आड़ में नए सिरे से अवैध वसूली में जुट जाती है।