वाराणसी। पांडेयपुर स्थित दीनदयाल अस्पताल परिसर में ढाई साल पहले आशा ज्योति केंद्र की स्थापना हुई। व्यवस्था बनाई गई कि पीड़ित महिलाओं की मदद के लिए हफ्ते के सातों दिन और चौबीसों घंटे केंद्र खुला रहेगा, लेकिन हकीकत में ऐसा होता नहीं है। अन्य सरकारी दफ्तरों की तरह केंद्र के कर्मचारी भी सुबह 10 बजे से शाम पांच बजे तक मौजूद रहते हैं और फिर यहां ताला लटक जाता है। ऐसे में समझा जा सकता है कि पीड़ित महिलाओं के लिए यह केंद्र कितना उपयोगी साबित हो रहा है।
दुष्कर्म, एसिड अटैक, छेड़खानी और घरेलू हिंसा से पीड़ित के अलावा मानसिक मंदित महिलाओं की मदद और काउंसिलिंग के लिए आठ मार्च 2016 को आशा ज्योति केंद्र की स्थापना की गई थी, मगर आज तक यह केंद्र संविदा कर्मियों के भरोसे ही संचालित हो रहा है। एक महिला सब इंस्पेक्टर, चार सिपाही और आठ होमगार्ड को छोड़ कर केंद्र में तैनात दो केस वर्कर, दो काउंसलर, पैरामेडिकल स्टाफ और दो वाहन चालक स्थायी होने की आस लगाए बैठे हैं। पीड़ित महिलाओं को आश्रय देने के लिए केंद्र में पांच बेड हैं, लेकिन उनके खानपान के लिए रसोईं घर की स्थायी व्यवस्था नहीं है। इस वजह से यहां आश्रय लेने के लिए आने वाली महिलाओं को नारी संरक्षण गृह या वृद्धा आश्रम भेज दिया जाता है। इस केंद्र के बारे में ज्यादा से ज्यादा महिलाओें को जानना चाहिए, लेकिन प्रचार-प्रसार का प्रयास ही नहीं किया जाता। इसके चलते पीड़ित महिलाएं सीधे थाने ही पहुुंचती हैं।
हर माह आती हैं 100 महिलाएं
आशा ज्योति केंद्र में प्रति माह 90 से 100 महिलाएं शिकायत लेकर आती हैं। इनमें से सर्वाधिक 80 प्रतिशत घरेलू हिंसा से पीड़ित महिलाएं होती हैं। दुष्कर्म या छेड़खानी पीड़ित आठ प्रतिशत, दहेज उत्पीड़न से पीड़ित पांच प्रतिशत, जमीन विवाद से पीड़ित पांच प्रतिशत और मानसिक मंदित दो प्रतिशत शिकायतें रहती हैं। केंद्र पर तैनात कर्मियों का कहना है कि कई बार थानों की पुलिस उनका सहयोग नहीं करती, इस वजह से उन्हें मामलों के निस्तारण में परेशानी होती है।
केंद्र दीनदयाल अस्पताल के पिछले हिस्से में सुनसान स्थान पर है। सुरक्षा कारणों से वहां रात भर महिलाएं नहीं रहती हैं। मगर, केंद्र चौबीसों घंटे काम करता है और सूचना मिलते ही टीम मौके पर पहुंचती है। -पीके त्रिपाठी, जिला प्रोबेशन अधिकारी