वाराणसी। बीएचयू में बीते साल सितंबर में हुए बवाल एवं लाठीचार्ज के मामले में हाईकोर्ट के अवकाशप्राप्त न्यायमूर्ति वीके दीक्षित की जांच रिपोर्ट सामने आने के बाद अब सबकी निगाह जिला और पुलिस प्रशासन की जांच रिपोर्ट पर टिक गई है। घटना के पांच महीने बीतने के कुछ समय बाद जहां न्यायमूर्ति दीक्षित ने अपनी जांच पूरी कर रिपोर्ट दे दी है, वहीं जिला प्रशासन की मजिस्ट्रेटी जांच और पुलिस विभाग के क्राइम ब्रांच की जांच पता नहीं है।
ऐसे हालात में यह स्पष्ट नहीं हो पा रहा है कि परिसर स्थित महिला महाविद्यालय गेट पर 23 सितंबर की रात छात्राओं पर लाठीचार्ज बीएचयू के सुरक्षाकर्मियों ने किया था या फिर परिसर के बाहर तैनात पुलिस और पीएसी के जवानों ने। मजिस्ट्रेटी जांच पूरी होने पर ही छात्र-छात्राओं के आंदोलन के मामले में बीएचयू प्रशासन और तत्कालीन कुलपति प्रो. जीसी त्रिपाठी की भूमिका स्पष्ट हो पाएगी। मजिस्ट्रेटी जांच के दौरान तकरीबन सौ छात्र-छात्राओं ने बयान दर्ज कराए थे। कुछ छात्रों ने लाठीचार्ज से संबंधित वीडियो फुटेज की सीडी बनाकर भी दी थी। बवाल के बाद मौके पर गए पुलिस-प्रशासनिक अधिकारियों के भी बयान दर्ज किए गए थे। मजिस्ट्रेटी जांच कर रहे एडीएम प्रशासन एमएन उपाध्याय का कहना है कि पुलिस से दो बिंदुओं पर सूचना मांगी गई है, जो अभी तक नहीं मिली है। जांच रिपोर्ट देने में इसीलिए देरी हो रही है।
उधर, बवाल के बाद एसएसपी आरके भारद्वाज ने क्राइम ब्रांच को जांच दी थी। लंका थाने में एक हजार अज्ञात के खिलाफ मुकदमा दर्ज किया गया था। क्राइम ब्रांच को तय करना था कि पूरे आंदोलन में बाहरी लोग तो शामिल नहीं थे। अगर ऐसा है तो ये लोग कहां से और क्यों आए थे। ये जांच भी अटकी हुई है। इतना जरूर है कि जो भी मामले दर्ज किए गए हैं, उनमें भी कार्रवाई नहीं की गई है।