वाराणसी। बीएचयू कला संकाय स्थित राधाकृष्णन सभागार में ‘सर्जक का पक्ष और मुक्तिबोध’ विषयक दो दिवसीय परिचर्चा सह काव्यपाठ के दूसरे दिन मंगलवार को वक्ताओं ने मुक्तिबोध के गद्य लेखन पर गंभीर विमर्श किया। मुख्य वक्ता वरिष्ठ कथाकार अखिलेश ने मुक्तिबोध की रचनाशीलता के नाभिक के रूप में उनकी ज्ञानात्मक संवेदना का उल्लेख किया। कहा कि उनकी रचनाशीलता में संवेदनात्मक ज्ञान दिखता है।
अखिलेश ने मुक्तिबोध के शिल्प एवं भाव संबंधी पहलुओं की चर्चा की। अध्यक्षता करते हुए कला संकाय प्रमुख प्रो. कुमार पंकज ने कहा कि मुक्तिबोध ने जीवन के आंतरिक पक्षों पर स्वयं को केंद्रित किया तथा उन तत्वों की शिनाख्त की जिनसे उनकी कविता की निर्मिति होती है। वरिष्ठ कवि और भोजपुरी अध्ययन केंद्र के समन्वयक प्रो. श्रीप्रकाश शुक्ल ने मुक्तिबोध के गद्यकार को उनकी कविता के महत्वपूर्ण तत्व के रूप में रेखांकित किया और वैदिक ऋचाओं का हवाला देकर कवि कर्म की चुनौतियों को सामने रखा।
उन्होंने कहा कि मुक्तिबोध का गद्य ज्ञानगंधी गद्य है जहां सर्जक का भाव ज्ञान के द्वारा अनुशासित रहता है। इसी कारण उनके यहां गद्य और पद्य का परंपरानुमोदित ढांचा बंधा-बधाया नहीं है । उनके गद्य में पद्य और पद्य में गद्य की व्याप्तियां हैं। डॉ. विंध्याचल यादव का वक्तव्य मुक्तिबोध के इतिहासकार व्यक्तित्व एवं इतिहास चेतना पर केंद्रित रहा। कार्यक्रम का संचालन शोध छात्र शिवकुमार यादव, अतिथियों का स्वागत ऋचा और धन्यवाद ज्ञापन भीम कन्नौजिया ने किया।
चौथे सत्र में मदन कश्यप की अध्यक्षता में आयोजित काव्यपाठ में प्रो. चंद्रकला त्रिपाठी, रामाज्ञा शशिधर, संजय मिश्रा, बसंत, संदीप नाईक, नीरज खरे, रामजी तिवारी, निशांत, अरुण, आनंद गुप्ता आदि ने कविताएं पढ़ीं।