काशी का दृश्य-श्रव्य माध्यम सिनेमा से भी खूब अठखेलियां करता रहा। फिल्मों के पितामह दादासाहब फाल्के खुद काशी में रहे। सत्यजीत रे ने काशी में ‘जय बाबा फेलूनाथ’ की शूटिंग फाल्के पुरस्कार पाने वाले सौमित्र चटर्जी के साथ की थी। तब के बनारस को जीकर सत्यजीत रे ने बनारस की तुलना वेनिस से की थी, जिसका वर्षों तक बनारसी अंदाज में अड़ियों पर अभिवादन चलता रहा। चरित्र अभिनेता कन्हैयालाल का तो गमछा भी अभिनय करता था। यहीं के त्रिलोक जेटली ने प्रेमचंद के ‘गोदान’ पर फिल्म बनाई थी, जिससे गीतकार समीर के पिता और प्रख्यात लेखक अंजान का फिल्मी करियर शुरू हुआ।
अहिंदी भाषी संपादकाचार्य पंडित बाबूराव विष्णु पराड़कर, लक्ष्मीनारायण गर्दे और रामकृष्ण रघुनाथ खाडिलकर के पत्रकारिता के दौर में खबरों की हैंड कंपोजिंग होती थी। फॉर्मा और फोटो के लिए ब्लॉक बनते थे। वर्ष 1972-73 में बतौर कार्टूनिस्ट मैं भी पत्रकारिता में दाखिल हो गया। तब मनोरंजन कांतिलाल के कार्टून में अखंड भारतीय राजनीतिक खड़खड़ाहट का पोस्टमार्टम दिखता था। कांतिलाल के बाद उनके शिष्य जगत शर्मा ने उनका खालीपन भरा। अब विनय कुल बनारसी अंदाज में रह-रहकर कार्टून उकेर देते हैं। मगर महसूस होता है कि संचार साधन और कार्टून एक-दूसरे से बिछड़ चुके हैं।
कुछ भी बिछड़ा है क्या? हां, बीते 25 वर्षों में पत्रकारिता और साहित्य के बीच शताब्दियों का संबंध। कुछ दशक पहले तक सभी पत्रकार साहित्यकार भी होते थे। खबरों की संवेदनाएं कहानियों जैसी होती थीं। वह पराड़कर युगीन मान्यताओं वाली रिपोर्टिंग बहुत याद आती है, जिसकी अंतिम कड़ी दीनानाथ गुप्त थे। मगर सच तो यह भी है कि जीवन में जब सब कुछ बदलता ही नहीं, तो वह याद ही क्यों आता। इसे रूपांतरण की तरह मानना चाहिए।