वाराणसी। काशी के चिर पुरातन रहस्य का अगर मंदिर प्रशासन पुरातात्विक अध्ययन कराए तो कई नई जानकारियां सामने आ सकती हैं। तीन साल पहले हुई खुदाई में क़ई ऐसी चीजें मिली थीं, जो गुप्त काल की थीं। जांच के बाद उस स्थान को पूरी तरह से बंद कर दिया गया। कॉरिडोर के लिए चल रहे ध्वस्तीकरण के बाद अब खुदाई के कार्य के लिए पर्याप्त स्थान है। अगर पुरातत्व विभाग से इस क्षेत्र में अध्ययन कराया जाए तो काशी से जुड़े कई रहस्य खुलेंगे। मगर ऐसा मंदिर प्रशासन के आग्रह पर ही संभव है।
वैसे काशी को विश्व की प्राचीनतम नगरी कहा जाता है। लेकिन इतिहासकारों और विशेषज्ञों के पास अब तक जो प्रमाण हैं, वह करीब डेढ़ हजार साल पुराने गुप्त काल तक के ही हैं। वर्ष 2016 में सरस्वती फाटक के पास स्थित एक लॉन में खुदाई शुरू हुई थी। इस खुदाई में भवनों के पुराने स्ट्रक्चर, भवनों और मंदिर के खंड सहित बहुत सी ऐसी चीजें मिलीं जो गुप्त कालीन मालूम होती थीं। पुरातत्वविदों के अनुसार खुदाई में बस्ती के लिए निर्माण और फर्श मिले। मंदिर प्रवेश का चौखट भी मिला, जिसपर नदी देवी गंगा का अंकन पाया गया। यह चौखट 11 वीं से 12 वीं शताब्दी का प्रदर्शित होता है।
तीन साल पहले हुई इस खुदाई को स्थानाभाव की वजह से रोक दिया गया और उसे पाट दिया गया। अब ध्वस्तीकरण के लिए पूरे परिसर को साफ किया जा रहा है। ऐसे में निर्माण से पहले इस जगह का पुरातात्विक अध्ययन करवा कर काशी के प्राचीनता के रहस्यों को खोला जा सकता है। ऐतिहासिक रूप से काशी की प्राचीनता को स्थापित किया जा सकता है।
पुरातत्वविद विदुला जाससवाल ने बताया कि काशी के प्राचीन इतिहास के बारे में जो देखना और जानना चाहती थीं, वह तो मिल गया है। जगह बहुत कम थी। इसके बाद भी बहुत सारी जानकारी मिल गई है। इससे काशी के प्रचीन होने का इतिहास मिलता है।