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परवल की खेती ने बदल दी किस्मत

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सीतामढ़ी। जहां एक ओर खेती से लोगों का मोहभंग हो रहा है, वहीं गंगा कि तरी में कठिन परिश्रम के बल पर परवल (पटर) की खेती कर दलित महिला चिंता ने न सिर्फ अपनी किस्मत बदल डाली बल्कि ऐसे तमाम लोगों के लिए एक मिसाल बन गई जो खेती-किसानी में आगे बढ़ना चाहते हैं। खेती से आर्थिक स्थिति मजबूत करने के साथ ही उसने शान शौकत से बेटी की शादी भी की।
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सीतामढ़ी से सटे बनकट गांव के दलित बस्ती निवासी आर्थिक रूप से कमजोर और अनपढ़ महिला चिंता देवी अपने परिश्रम के बल पर न केवल अपनी आर्थिक स्थिति मजबूत की अपितु अपनी बेटी की शादी भी शान शौकत से की। गंगा के कछार में सब्जी की खेती के अपने अनुभवों को साझा करते हुए चिंता देवी ने बताया कि पहले गाजीपुर के ठेकेदार खेती करते थे, उसी में वह मजदूरी करती थी। तबसे उसने मन ही मन ठान लिया कि वह इस कार्य को वह खुद करेगी। पिछले तीन वर्षों से इस कार्य में जुटकर खेती में उसने महारत हासिल कर अब दूसरों को भी प्रेरित कर रही है। बताया कि गंगा की कछार में परवल की खेती में अच्छा मुनाफा तो है, लेकिन कठिन परिश्रम, मोटी पूंजी के साथ नुकसान का जोखिम भी है। महिला किसान चिंता देवी ने बताया कि परवल (पटर) सब्जी की खेती की शुरुआत अक्टूबर नवंबर माह में होती है। मिट्टी में इसका तना रोपा जाता है। तना छपरा बिहार से आता है, जो काफी महंगा होता है। इसी तरह जमीन किराया, ट्रैक्टर जुताई, दवा, पानी, मजदूरी आदि तमाम खर्चे मिला दें तो प्रति बीघे लगभग 50 हजार रुपये का खर्च आता है। अगर मौसम और किस्मत ने साथ दिया तो खर्च के बराबर मुनाफा हो जाता है। बताया कि अधिक पानी, धूल, और मकड़ी के जाले इसके दुश्मन है। इसके खरीददार व्यापारी रोज खेतों में आकर खरीद कर पूर्वांचल के मंडियों में ले जाते हैं।
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