‘यह सच है, याद शहीदों की हम लोगों ने दफनाई है, यह सच है, उनकी लाशों पर चलकर आजादी आई है। यह सच है, हिंदुस्तान आज जिंदा उनकी कुर्बानी से...।’गाजीपुर जिले के ऐसे शहीदों के जांबाज जज्बे को सलाम किए बिना हम नहीं रह सकते हैं। बात उन शहीदों की है, जो प्रथम विश्व युद्ध में अपने प्राणों को देश के लिए न्योछावर किए थे।
इनमें से कुछ शहीद एशिया के सबसे बड़े गांव माने जाने वाले गहमर के रहने वाले भी थे। गहमर को सैनिकों का गांव भी कहा जाता है। वर्ष 2017 प्रथम विश्व युद्ध के 130 साल पूरा हो गया है। सन् 1914 में 28 जुलाई को यूरोप, अफ्रीका और मघ्य पूर्व (आंशिक रूप से चीन और प्रशांत दीप समूह) के खिलाफ दुनिया के कई देशों की सेनाओं ने लड़ाई शुरू की थी। इस विश्वयुद्ध में जिले के गहमर गांव के रणबांकुरे भी शामिल थे। उनकी कुल संख्या 228 थी, जिसमें से 21 शहीद हुए थे।
प्रथम विश्व युद्ध में देश के लिए कुर्बानी देने वाले गहमर के शहीदों की चर्चा इसलिए जरूरी है कि देश पर मर-मिटने के बाद भी इन्हें याद करने वाला आज कोई नहीं है। गांव में स्थित माध्यमिक और उच्च माध्यमिक विद्यालय परिसर में इनकी शहादत की याद में एक छोटा सा शिलापट्ट जरूर लगा है। गांव के बुजुर्गों की माने तो सन् 1914 में देश पर अंग्रेज हुकूमत करते थे।
इसी बीच प्रथम विश्व युद्ध की घोषणा हुई थी। महायुद्ध में अपनी मौजूदगी दर्ज कराने के लिए ब्रिटिश शासन ने भारतीय जवानों को लड़ाई में झोंक दिया था। इसमें गहमर गांव के 228 जवानों को तब लड़ाई लड़ने के लिए भेजा गया। जिसमें से 21 जवान शहीद हो गए थे। इन लड़ाकों को गांव के बाहरी लोग जरूर नमन करते हैं, लेकिन गहमर गांव के लोग इन्हें भूल गए हैं। दुखद यह है कि प्रथम विश्व युद्ध के शहीदों को बारे में वर्तमान पीढ़ी कुछ नहीं जानती।
गांव के भूतपूर्व सैनिक समिति के लोगों का कहना है कि हर साल 28 जुलाई को समाधि स्थल पर जाकर हम लोग फूल-माला चढ़ाकर शहीदों को श्रद्धांजलि देने का काम करते हैं। लेकिन सच यही है कि लोगों को गहमर के उन शहीदों का नाम तक भी नहीं मालूम है। गहमर निवासी और वरिष्ठ समाजसेवी गौरी चौरसिया का कहना है कि मुझे शहीदों के गांव में जन्म लेने पर गर्व है। दुख इस बात का है कि आज शहीदों को याद करने वाला कोई नहीं है।
महायुद्ध की वजह से औद्योगिक क्रांति के बाद दुनिया में आमूल परिवर्तन हुआ। बड़े देशों ने सैन्य शक्ति बढ़ाने के साथ ही कूटनीतिक संधियां की। बावजूद संबंध बेहतर न होकर दुश्मनी और बढ़ गई। उसी दरम्यान आस्ट्रेलिया के उच्चाघिकारी आच्रड यूक फर्डोनेड और उनकी पत्नी की हत्या कर दी गई। तब प्रथम विश्व युद्ध की यही प्रमुख वजह थी। दोनों हत्याएं 28 जून 1914 को हुई थी।
इसके बाद आस्ट्रेलिया ने सर्बिया के विरुद्ध युद्ध की घोषणा कर दी। म़ित्र राष्ट्र रूस, फ्रांस और ब्रिटेन ने सर्बिया की मदद की जबकि जर्मनी ने आस्ट्रेलिया का साथ दिया। महायुद्ध की समाप्ति 11 नवंबर 1918 को हुई थी। इसके बाद गहमर के शहीदों के लिए आज तक कुछ नहीं किया गया। गांव में इनके नाम पर एक शहीद स्थल तक नहीं बना है। इन शहीदों के बारे में महत्वपूर्ण जानकारी तक देने वाला कोई नहीं है।
रिटायर्ड सैन्य अधिकारी कर्नल अखिलेश उपाध्याय तथा कर्नल दिनेश उपाध्याय ने बताया कि हम लोग हर साल 28 जुलाई को प्रथम विश्व युद्ध के शहीदों को श्रद्धांजलि देते हैं। यहां के सिपाहियों ने फ्रांस, अरब, मिश्र, फिलीस्तीन सहित कई देशों में अपना युद्ध कौशल दिखाया है। गहमर के एक सिपाही को सर्वोच्च सैनिक पदक विक्टोरिया क्रास भी मिला।