वाराणसी। कढ़ाई-बुनाई कहने को तो गुजरे जमाने की बात हो गई लेकिन एक बार फिर से हाथ से की गई कारीगरी का फैशन चढ़ने लगा है। आज परिधानों पर की जाने वाली कढ़ाई पर भले ही मशीनों का कब्जा हो गया हो लेकिन फैशन की दुनिया ने इसे फिर से जिंदा कर दिया है।
सूक्ष्म लघु व मध्यम उद्यम मंत्रालय भारत सरकार के क्रोशिया कलस्टर ने इस कला में नई जान डाल दी है। तेलियाबाग में लगी आंचलिक स्तरीय प्रदर्शनी में इनसे बने बच्चों के स्वेटर, मफलर, मेजपोश, टोपी, पर्दे लोगों को खासा पसंद आ रहे हैं। सूती धागे से छह इंच लंबी हुकदार सलाई से की जाने वाली कारीगरी अब फैशन के लेटेस्ट ट्रेंड में शामिल हो गई है। रंग-बिरंगे धागे से लैस या जाली की बुनावट के साथ तैयार किया गया ये काम विदेशी भी खूब पसंद कर रहे हैं। महीन धागे को सलाई पर लपेटते हुए हुक के सहारे झालर, मेजपोश, पोंचू टॉप, टी-शर्ट वगैरह खूब पसंद किए जा रहे हैं।
ऊन और सलाई से स्वेटर बुनना आसान
आंचलिक स्तरीय प्रदर्शनी में क्रोशिया से बनाए उत्पादों का स्टॉल लगाने वाले देवरिया के हस्त शिल्पी राज श्रीवास्तव बताते हैं कि ऊन और सलाई से स्वेटर बुनना आसान होता है। क्रोशिया सलाई की अपेक्षा काफी छोटी होती है साथ ही क्रोशिया का धागा भी ऊन की अपेक्षा पतला रहता है। तिल-तिल के बराबर बुनाई की जाती है। खास बात यह है कि यह बेहद दिमाग वाला काम है। क्योंकि इसमें ज्यामितिक आकृति से बुनाई की जाती है। जाली को बुना जाता है ताकि बनाए गए आकार में कलाकृतियां स्पष्ट नजर आएं। उन्होंने बताया कि पीएम नरेंद्र मोदी की स्फू र्ति योजना के तहत इस कार्य से देवरिया की 400 से 500 महिलाएं जुड़कर खुद को आत्मनिर्भर बना रही हैं।
भारत में यह कला दक्षिण भारत में अठारहवीं शताब्दी में शुरू हुई, यहां मुगल महिलाओं ने इसे अपनाया और फिर हैदराबाद से लेकर उत्तर प्रदेश व दिल्ली में फैला हुआ है। उत्तर भारत में आज से करीब 15 साल पहले तक लड़कियां व महिलाएं क्रोशिया से बुनाई करती थीं।