वाराणसी। भोर का समय और बड़ी संख्या में महिला पुरुष गंगा के किनारे और नाव से अस्सी घाट, वहां से सिर पर सामान रखे, नंगे पांव आगे बढ़ते हुए, टूटी सड़कों, पगडंडियों और गलियों से होते हुए आगे बढ़ते जा रहे थे। चेहरे पर न शिकन और न ही थकान। श्रद्घालुओं की जुबान पर केवल बाबा भोले का नाम चल रहा था। यह पूरा नजारा था मार्गशीर्ष माह के शुक्लपक्ष पूर्णिमा को काशी में किए जा रहे अंतरगृहि परिक्रमा का।
काशी की पंचक्रोषी परिक्रमा के दौरान हुए पापों से मुक्ति पाने के लिए अंतरगृहि परिक्रमा की जाती है। इसमें ठंड के बावजूद धर्म के प्रति आस्थावान श्रद्धालु इस परिक्रमा में शामिल होते हैं। नंगे पांव व सर पर खाने पीने का सामान लिए यह लोग पैदल ही निकलते हैं। परंपरा को जीवित रखते हुए किए जा रहे इस परिक्रमा की शुरुआत मणिकर्णिकाघाट से संकल्प लेकर होती है। वहां से श्रद्धालु नाव से अस्सी घाट, अस्सी से जगन्नाथ मंदिर की गली होते हुए पुष्कर तालाब, रामानुज कोट होते हुए संकटमोचन वहां से नरिया शुकुलपुरा के बैरवनवा मंडुवाडीह फ्लवरिया होते हुए कैंटोमेंट से होते हुए वरुणा और गंगा के संगम के पास विश्राम करते हैं। भोर में फिर यात्रा शुरू होती है जहां से लोग मणिकर्णिका घाट जाकर संकल्प छोड़ते हैं। बाबा विश्वनाथ का दर्शन पूजन करके इस व्रत का समापन करते हैं।