वाराणसी। कबीर के ताने-बाने पर आधारित उपन्यास ‘झीनी झीनी बीनी चदरिया’ में जुलाहों, बुनकरों के जीवन संघर्ष को उकेर कर साहित्य जगत में अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान बनाने वाले कथाकार प्रो. अब्दुल बिस्मिल्लाह को शुक्रवार को वर्ष 2017 के प्रतिष्ठित सावित्री त्रिपाठी स्मृति सम्मान से नवाजा गया। बीएचयू के हिंदी विभाग सभागार में चर्र्चित कथाकार प्रो. काशीनाथ सिंह ने उन्हें यह सम्मान दिया। इस मौके पर काशीनाथ ने झीनी झीनी बीनी चदरिया को बुनकरों पर भारतीय भाषा का पहला उपन्यास बताया। उन्होंने बताया कि इस उपन्यास की पांडुलिपि पढ़कर मैं पहली बार बुनकरों की मुश्किल, जद्दोजहद, परेशानी और उनको लूटने वालों के साथ ही उनकी बोली-भाषा के बारे में जानकर चमत्कृत हुआ था।
समारोह के उद्घाटन के बाद प्रो. अवधेश प्रधान ने उन दिनों की यादें जाता कराईं जब कोयला बाजार में किराए के घर में रहकर अब्दुल बिस्मिल्लाह नेशनल इंटर कॉलेज में पढ़ाते थे। उन्होंने बताया कि तब राजनीतिक क्रांतिकारियों की चौपालों के चलते उनका वहां आना-जाना होता था। बुनकर बस्ती में रहकर अब्दुल बिस्मिल्लाह ने जिस तरह उनके मर्म को पकड़ा और जिया, और बनारस की संस्कृति के साथ उनकी भावनाओं की तह तक पहुंचे, यह उनके उपन्यास में दिखता है। उनकी तपाक से मिलने की गर्मजोशी, मस्ती, दीवानगी में बनारस दिखता है। उनमें हमेशा बनारस दिखता है दिल्ली नहीं। अब्दुल बिस्मिल्लाह इस मौके पर अभिभूत नजर आए। उन्होंने कहा कि यह दिन उनके लिए एक पर्व जैसा है। इन क्षणों ने मेरे अस्तित्व को प्रकाश से भर दिया है। उन्होंने ‘झीनी झीनी बीनी चदरिया’ उपन्यास से जुड़े कई संस्मरण भी सुनाए। इस मौके पर हिंदी के कवि अष्टभुजा शुक्ल, प्रो. बलराज पांडेय, हिंदी विभाग के अध्यक्ष प्रो. अशोक सिंह, प्रो राजकुमार, प्रो. मनोज कुमार सिंह, डॉ. नीरज खरे, डॉ. एहसान हसन ने भी विचार व्यक्त किए। संचालन मानवेंद्र प्रताप सिंह ने एवं आभार डॉ. शैलेंद्र प्रताप सिंह ने जताया।
अब तक सावित्री त्रिपाठी सम्मान से नवाजे गए साहित्यकार
सावित्री त्रिपाठी स्मृति सम्मान ऐसे लेखकों को प्रदान किया जाता है जिनकी रचनात्मकता में बनारस की भूमिका रही हो। अब तक यह सम्मान प्रो चौथीराम यादव, प्रो अवधेश प्रधान, प्रो देवेंद्र, प्रो दिनेश कुशवाह और डॉ अनुज लुगुन को दिया जा चुका है।
‘झीनी झीनी भीनी चदरिया’ बनारस की जमीन का उपन्यास है। श्रम के सौंदर्य, बुनकरों की जिजीविषा का वर्णन और साड़ी उद्योग की चमक समाज में दिखती है। इस उपन्यास में कोऑपरेटिव सोसाएटी के यथार्थ के अलावा छोटे -छोटे प्रेम प्रसंगों के अलावा भाषा में भदेस गालियों का भी प्रयोग हुआ है। डॉ. नीरज खरे।