वाराणसी। तिब्बती धर्मगुरु दलाई लामा ने कहा कि भारतीय दर्शन से ही दुनिया में शांति स्थापित होगी। आने वाली सदी संवाद की है। विश्व शांति के लिए हमें संवाद स्थापित करना होगा और अतीत की बातों को भूलकर आगे बढ़ना होगा। भगवान बुद्ध की उपदेशस्थली सारनाथ से परमपावन ने खुशहाल विश्व की रचना का आह्वान किया। कहा, हम अपने ज्ञान, बुद्धि और मन के रचनात्मक प्रयोग से एक खुशहाल बनाएं और हमारी कोशिश हो कि हम लोगों को खुश रखने का माध्यम बनें।
शनिवार को केंद्रीय उच्च तिब्बती शिक्षा संस्थान के स्वर्ण जयंती समारोह के दौरान ‘भारतीय दार्शनिक प्रस्थानों एवं आधुनिक विज्ञान में मन की अवधारणा’ विषयक संगोष्ठी का उद्घाटन करने के बाद दलाई लामा उपस्थित जनसमुदाय को संबोधित कर रहे थे। कहा कि हम 21वीं सदी की शुरुआत में हैं और ये हमारी जिम्मेदारी है कि इस सदी को शांतिपूर्ण बनाएं। इसके लिए हमें अपने बीच की दीवारें तोड़नी हाेंगी। हर युद्ध का कारण घृणा और क्रोध है। इसलिए हमारी जिम्मेदारी है कि हम स्वयं और आने वाली पीढ़ी में करुणा और प्रेम की भावना विकसित करें।
बेहद भावुक होते हुए कहा कि हम शारीरिक पवित्रता के बारे में तो सोचते हैं लेकिन अब हमें भावनाओं की पवित्रता की ओर बढ़ना होगा। हमें एकात्म की भावना के साथ आगे बढ़ना होगा और ये भारतीय दर्शन से ही संभव है। आने वाले नए साल में विश्व में शांति का संदेश भारतीय दर्शन की इसी भूमि से दिया जा सकता है, जहां से गौतम बुद्ध ने शांति का संदेश दिया।
इससे पहले संगोष्ठी का विषय प्रवर्तन संस्थान के कुलपति प्रो. गेशे नवांग समतेन ने किया। कहा कि भारतीय ज्ञान परंपरा की सांख्य, वेदांत, न्याय, वैशेषिक, बौद्ध व जैन परंपराओं के विद्वानों-साधकों का आधुनिक वैज्ञानिकों के साथ मानव मन के विभिन्न आयामों पर संवाद बेहतर निष्कर्ष देगा। कहा कि मन हमारे अस्तित्व का महत्वपूर्ण अवयव है। मन के रूपांतरण के बिना आभ्यांतरिक और वाह्य शांति की स्थापना संभव नहीं है। संचालन प्रो. जोश केब्जन ने किया।