वाराणसी। होलिका दहन की तैयारी पूरी हो चुकी है। लगभग सभी चौराहों और तिराहों पर लकड़ियों के बीच होलिका की प्रतिमा स्थापित की गई, लेकिन शहर में कुछ होलिका ऐसी भी हैं जो पर्यावरण संरक्षण का संदेश दे रही हैं।
जिले में छोटे बड़े करीब 23 सौ स्थानों पर बुधवार को होलिका दहन होगा। इसके लिए लकड़ी, उपले और पुआल आदि चौराहों और तिराहों पर रखे गए हैं। कई होलिका में लोगों ने खराब टायर, घर का जलाऊ कचरा और प्लास्टिक का कबाड़ डाल दिया हैं। जबकि परंपरा के अनुसार, इस आयोजन को पवित्र माना गया है। इसलिए ऐसे स्थान पर कचरा और हरे पेड़ काटकर डालने का कोई नियम नहीं है। इन सबके बीच शहर में कुछ ऐसी भी होलिका हैं, जिन्हें ईको फ्रेंडली बनाया गया है। शिवपुर क्षेत्र के अर्दली बाजार, भोजूबीर, सदर तहसील और मंडुवाडीह में कई ऐसी होलिका हैं, जहां उपले और सूखी लकड़ी रखी गई है।
होलिका दहन जो मूलत: वैदिक सोमयज्ञ अनुष्ठान से आरंभ हुआ है। होलिकोत्सव इसी महाव्रत की परंपरा का संवाहक है। होली में जलाई जाने वाली आग यज्ञवेदी में निहित अग्नि का प्रतीक है। वैदिक युग में इस यज्ञवेदी के पास गूलर के पेड़ की सूखी टहनी गाड़ी जाती थी। क्योंकि गूलर का फल माधुर्य गुण की दृष्टि से सर्वोपरि माना जाता है और यह समाज में आपसी सौहार्द को बढ़ाते हुए वातावरण को शुद्ध करता है। ज्योतिषाचार्य पं. गणेश प्रसाद मिश्र ने कहा कि हरे वृक्षों में जीवांश रहता है, जिसे जलाने की आज्ञा शास्त्र नहीं देते। शास्त्र विधान के अनुसार, सूखे उपले, गोहरी आदि जलाने का विधान है। भारतीय संस्कृति में वृक्ष को दानी गुरु माना गया है जो अपना सर्वस्व दान दे देता है। इस नजरिए से हरे वृक्ष को होलिका दहन वर्जित है।
होलिका पर्व फाल्गुन शुक्ल पूर्णिमा को होता है। इसका मुख्य संबंध होलिका दहन से है जो बुधवार 20 मार्च को होगी। इस दिन भद्रा भी शुरू हो रहा है। भद्रा दिन में 9 बजकर 19 मिनट से रात्रि 8 बजकर 12 मिनट तक है। चूंकि भद्रा में होलिका दहन नहीं किया जाता है, इसलिए रात्रि 8 बजकर 12 मिनट के बाद ही होलिका दहन शुभ होगा।