वाराणसी। शहीदान-ए-करबला की याद में एक अक्तूबर को मुहर्रम के तौर पर पूरी दुनिया इमाम हुसैन और उनके साथियों की शहादत का गम मनाएगी। यौम-ए-आशूरा यानी मुहर्रम पर इमाम की याद में ताजियों का जुलूस उठाया जाएगा। ...या हुसैन की सदाओं संग हर इलाके से ताजिये उठाए जाएंगे जो करबला जाकर ठंडे किए जाएंगे। मुहर्रम के मद्देनजर ताजियों के बनाने और उन्हें सजाने संवारने का काम शुरू हो गया है।
लल्लापुरा में चार मुस्लिम परिवार कागज और लकड़ी के ताजिये बनाने में जुट गए हैं। यहां पर तकरीबन छोटे बड़े 150 से अधिक ताजिये बनते हैं। इनमें ज्यादातर ताजिये मन्नती होते हैं। कोई अपनी मन्नत पूरी होने पर तो कोई मन्नतें और मुरादें मांगने के लिए इमाम चौक पर ताजिये बैठाता है। दाऊद बताते हैं कि ये उनका पुश्तैनी काम है। साल भर में मुहर्रम के दौरान करीब महीने भर पहले वो ताजिये बनाना शुरू कर देते हैं। इसी तरह कोयला बाजार, सदर बाजार, बजरडीहा में भी ताजिये बनाने का काम शुरू है।
उधर शहर की खास ताजियों की मरम्मत और उन्हें सजाने संवारने का काम शुरू हो गया है। बनारस के सबसे ऐतिहासिक रांगे के ताजिये की साफ-सफाई शुरू हो गई है। रांगे और चांदी से बने इस ताजिये के उठने के बाद ही शहर के दूसरे ताजिये उठाए जाते हैं। इसी तरह रेवड़ी तालाब में नगीने वाला ताजिया, शीशे का ताजिया, पीतल का ताजिया, मोटे शाहबान का ताजिया, बुर्राक का ताजिया, लकड़ी और अर्दली बाजार का जरी का ताजिया शहर के खास ताजियों में हैं। ये ताजिये आठवीं व नौवीं मुहर्रम को लोगों की जियारत के लिए इमाम चौक पर बैठाए जाएंगे।