वाराणसी। ईद के दिन अल्पसंख्यक समुदाय के 5 करोड़ छात्रों को छात्रवृति देने की घोषणा का संत समाज ने विरोध करना शुरू कर दिया है। इस घोषणा को केवल वोट की राजनीति बताया जा रहा है। इसको लेकर संतों ने पत्र जारी करते हुए मौजूदा सरकार से अल्पसंख्यक की परिभाषा पूछी है। कहा कि पहले सरकार को अल्पसंख्यक तय करना चाहिए।
अखिल भारतीय संत समिति के महामंत्री स्वामी जितेंद्रानंद सरस्वती ने बताया कि मैंने कुल नौ विंदुओं पर प्रधानमंत्री, अल्पसंख्यक कल्याण मंत्रालय, गृह मंत्रालय और अल्पसंख्यक आयोग को पत्र लिखा है। उन्होंने कहा कि भारतीय संविधान की प्रस्तावना में ही एक जन एक राष्ट्र की भावना की बात कही गई है। इसलिए अल्पसंख्यक शब्द की परिभाषा कहीं से संविधान में तो नहीं है। दिसंबर 1992 में कांग्रेस सरकार द्वारा पहली बार अल्पसंख्यक आयोग का गठन संसद में प्रस्ताव लाकर किया गया और यह संविधान की मूल अवधारणा के विरुद्ध था। जितेंद्रानंद सरस्वती ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट की एक बेंच ने 2002 में यह कहा है कि अल्पसंख्यक की स्थिति राष्ट्रीय स्तर पर नहीं वरन राज्य स्तर पर ही तय की जानी चाहिए, क्योंकि भारत के आठ राज्यों जम्मू कश्मीर, मेघालय, मिजोरम, पंजाब, लक्षद्वीप, नगालैंड, अरुणांचल प्रदेश और मणिपुर में हिंदू भी अल्पसंख्यक हैं। यहां ढाई प्रतिशत से लेकर 38 प्रतिशत तक ही हिंदू हैं, तो क्या इस कानून के तहत मिलने वाले लाभ को हिंदू अल्पसंख्यक लेने का हकदार नहीं है। क्या इन 8 राज्यों में अल्पसंख्यक हिंदुओं को सरकार की ओर से दी जानी वाली सुविधाएं नहीं मिलनी चाहिए। संत समाज ने कहा कि सरकार छात्रवृति अल्पसंख्यकों को बाटे हमें खुशी है, लेकिन उसमें आठ राज्यों का अल्पसंख्यक हिंदू भी हो और सुप्रीम कोर्ट के तय मापदंडों का पालन हो। सभी के दिमाग में अल्पसंख्यक का मतलब मुसलमान बैठा दिया गया है, जो गलत है। उन्होंने बताया कि संतों के समिति में केंद्रीय मार्गदर्शक दल की बैठक 19-20 जून को हरिद्वार में होने वाली है। जिसमें इस विषय पर भी चर्चा होगी।