वाराणसी। बगैर सेवईं के ईद पूरी नहीं होती। इसमें भी बनारस की सेवईं के क्या कहने। पूर्वांचल भर में बनारसी सेवईयों की धूम है। यहां की किमामी सेवई न सिर्फ पूर्वांचल में बल्कि पूरे उत्तर प्रदेश समेत मध्य प्रदेश, बिहार, मुंबई, दिल्ली और कोलकाता भर में मशहूर है।
बनारस में यूं तो पहले मदनपुरा, दालमंडी में सेवइयां बनती थीं लेकिन अब सिर्फ भदऊं इलाके में सेवइयां बनाने का काम होता है। रमजान आने के करीब दो महीने पहले से लोग इस काम में लग जाते हैं। बनारस की सेवईं की खास बात यही है कि ये काफी महीन होती है। ये मुसलमानी सेवईं के नाम से भी मशहूर है। बनारस के सेवईं की एक और खास बात ये है कि इस काम में केवल हिंदू परिवार ही लगा है। पुश्तों से सेवईं के गृह उद्योग से जुड़े नंद लाल मौर्या बताते हैं कि करीब साठ साल पहले उनके पिता स्वर्गीय बिहारी लाल ने हाथ से सेवईं पारने का काम शुरू किया था। अब तो इसके लिए मशीन आ गई है लेकिन आज भी इसमें मेहनत खूब लगती है। उनके बेटे अनूप व अचल मौर्या भी इस काम में लगे हैं। वाराणसी सेवईं एसोसिएशन के सेक्त्रस्ेटरी सच्चेलाल अग्रहरि का कहना है कि बनारस की सेवईं का जोड़ कहीं नहीं मिलता। ईद के दौरान करीब 50 हजार कुंतल सेवइयां बिक जाती हैं।