वाराणसी। शहर की बुनियादी सुविधाएं यूं ही बदहाल नहीं। अवैध कॉलोनियों का फैलता जाल बुनियादी संसाधनों पर भारी पड़ रहा है। साथ ही, सरकारी खजाने को करोड़ों के राजस्व की चपत बैठ रही है। शहर के सामने चुनौतियों की यह बाढ़ जिम्मेदारों के नकारेपन से आई। तीन दशक से जारी अनियोजित विकास से शहर का बेड़ा गर्क होता गया और निगरानी की जिम्मेदारी संभालने वाले मलाई काटकर भारी हो गए। वीडीए से बिना नक्शा पास कराए शहरी सीमा में बसाई गईं अवैध कॉलोनियों से अकेले जलकल को 450 लाख रुपये सालाना की चपत लग रही है। तीन दशक का आंकड़ा देख लें तो जलकल को हुआ नुकसान औसतन लगभग 121 करोड़ रुपये पहुंच जाएगा।
हालात ऐसे हैं कि अवैध कनेक्शनों की मार से जलकल के इंतजाम लड़खड़ा रहे हैं। इनसे एक रुपये राजस्व तो मिल नहीं रहा लेकिन पानी की खपत कई गुना बढ़ गई। इसका खामियाजा कर चुकाने वाले वैध कनेक्शनधारी कहीं दूषित जलापूर्ति तो कहीं पर्याप्त जलापूर्ति न होने के रूप में भुगत रहे हैं। ऐसा नहीं है कि इन तथ्यों से जलकल, नगर निगम या फिर जिला प्रशासन के उच्चाधिकारी वाकिफ नहीं हैं। बावजूद इसके, स्थानीय स्तर से लेकर लखनऊ तक फैले इस गठजोड़ की जड़ें इतनी गहरी हैं कि कोई कुछ बोलने को तैयार नहीं है। पहले की बसीं अवैध कॉलोनियों को नियमित कर वहां बुनियादी सुविधाओं के विस्तार पर भी अब तक कोई ठोस पहल नहीं हो पाई है। सबसे हैरानी यह कि जनप्रतिनिधियों और अफसरों की चुप्पी के चलते नई आबाद हो रहीं अवैध कॉलोनियों पर भी लगाम नहीं कस पा रहा है।
वीडीए उपाध्यक्ष पुलकित खरे के अनुसार 1990 के बाद किसी कालोनी का एप्रुवल और ले आउट नहीं है और ऐसी पांच सौ से अधिक अवैध कॉलोनियां विकसित हैं। नगर निगम के रिकार्ड में 1.82 लाख भवन दर्ज हैं, जिनसे गृहकर तो लिया जाता है लेकिन जलकल की ओर सीवर और पानी कर की वसूली सिर्फ 90 हजार भवनों से की जाती है। वजह, 62 हजार से अधिक भवनों तक पाइप लाइन नहीं है जबकि मुलाजिमों की मिलीभगत से 30 हजार भवनों में अवैध कनेक्शन हैं। जलकल प्रति भवन सालाना 1300 से पंद्रह सौ तक कर वसूलता है। इस तरह तकरीबन साढ़े चार करोड़ रुपये वार्षिक राजस्व का नुकसान हो रहा है। कई नई बसीं कॉलोनियों में अब तक नगर निगम में भी दर्ज नहीं हैं।