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तारतम सागर पर शोध से आएगी जागृति

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वाराणसी। भारत अध्ययन केंद्र एवं महामति प्राणनाथ साहित्य परिषद के संयुक्त तत्वावधान में संगोष्ठी का आयोजन किया गया। संत साहित्य और महामति प्राणनाथ विषयक दो दिवसीय गोष्ठी का शुभारंभ अंबरीष चंचल के गायन से हुआ। आचार्य सूर्य नारायण दास महाराज ने कहा कि महामति प्राणनाथ ने वैचारिक क्रांति के लिए 17वीं शताब्दी में धार्मिक समन्वय को व्यवहारिकता प्रदान की। उनके ग्रंथ तारतम सागर पर शोध कार्य से मानव कल्याण में जागृति आएगी। उन्होंने घोषणा की कि महामति प्राणनाथ साहित्य परिषद शोधार्थियों को आर्थिक अनुदान करेगी।
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प्रो. पृथ्वीश नाग ने कहा कि भारत का सांस्कृतिक मानचित्र अत्यंत कठिन है। भारत की भक्ति परंपरा में उत्तर पश्चिम में सगुण संतों की बहुलता है। कुलसचिव डॉ. नीरज त्रिपाठी ने कहा कि संत प्राणनाथ ने भारत का भ्रमण करके भारत की आध्यात्मिक विरासत को आगे बढ़ाया है। धन्यवाद ज्ञापन करते हुए प्रो. अनिल जैन ने कहा कि उत्तर मध्यकाल में महामति प्राणनाथ कुरान,बाइबल, भागवत पुराण में निहित ईश्वर के स्वरूप में एकता दिखाने का अथक प्रयास करते हैं। नेपाल से आए प्रो. काशीनाथ न्योपाने ने कहा कि नेपाल में प्रणामी संप्रदाय के करीब 10 लाख से अधिक दीक्षित लोग तथा पांच सौ मंदिर हैं। प्रणामी साहित्य में संस्कृत भाषा के विद्वानों को प्रवेश कराया जाए। इस दौरान प्रो. प्रवेश भारद्वाज, डॉ. मुरलीधर द्विवेदी, प्रो. कैलाश नाथ तिवारी, प्रो. ताबिर कलाम, प्रो. रणजीत साहा ने विचार व्यक्त किए। मंच संचालन प्रो. सदाशिव कुमार द्विवेदी और स्वागत प्रो. राकेश कुमार उपाध्याय ने किया।
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