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साहित्यिक परंपरा से नई पीढ़ी को जोड़ना जरूरी

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वाराणसी। आईआईटी बीएचयू में काशी कथा की ओर से चल रही 14 दिवसीय कार्यशाला के आठवें दिन काशी की साहित्यिक परंपरा के साथ ही इस पर साहित्यकारों के योगदान की चर्चा की गई। इस दौरान वृत्त चित्र के माध्यम से जेम्स प्र्रिंसेप के बनारस में योगदान को दिखाया गया। बतौर मुख्य वक्ता प्रो. अवधेश प्रधान ने कहा कि काशी में साहित्य की एक लंबी परंपरा रही है, जो आज भी विद्यमान है। इससे नई पीढ़ी को जोड़ना जरूरी है।
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मालवीय उद्यमिता संवर्धन केंद्र के सभागार में आयोजित कार्यशाला में प्रो. प्रधान ने कहा कि काशी की साहित्यिक परंपरा का प्रारंभ भक्ति काल से माना जा सकता है। यहां रविदास और कबीर ने समाज को संगठित किया तो तुलसीदास ने समाज को आत्मविश्वास दिया। पहली बार महाभारत का स्तरीय अनुवाद काशी में ही किया गया।
कार्यशाला के पहले सत्र में जेम्स प्रिंसेप के योगदान के बारे में रामानंद तिवारी ने कहा कि वसुधैव कुटुंबकम का भाव काशी में ही है, अन्यत्र नहीं। काशी का पहला नक्शा जेम्स प्रिंसेप ने बनाया। पहली बार बनारस की जनगणना, मौसम रिकॉर्ड, ड्रेनेज सिस्टम और विश्वेश्वरगंज के रूप में सुनियोजित बाजार जेम्स प्रिंसेप का ही योगदान है। कार्यक्रम की अध्यक्षता प्रो. एसएन उपाध्याय, संचालन डॉ. अवधेश दीक्षित और धन्यवाद ज्ञापन सुजीत चौबे ने किया। इस दौरान आचार्य योगेंद्र, बलराम यादव, गोपेश पांडेय, डॉ. विकास सिंह, दीपक तिवारी, अभिषेक यादव, जय प्रकाश चतुर्वेदी, हनुमान प्रसाद गुप्ता आदि मौजूद रहे।
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