वाराणसी। कचहरी बम धमाके में मोहनसराय कनेरी निवासी अधिवक्ता बुधिराज पटेल की मौत के बाद उनकी पत्नी संगीता माला तैयार कर तीन बच्चों कोे पाल रही हैं। संगीता कहती हैं कि कुछ रुपये मिले थे जो खत्म हो गए। फिर, कोई पूछने तक नहीं आया। अपने लिए नहीं तो बच्चों के लिए तो जीना है ना...। 23 नवंबर 2007 को कचहरी में हुए सीरियल बम ब्लास्ट में जान गंवाने वाले अधिवक्ताओं सहित नौ लोगों और घायल हुए 51 लोगों में से अधिकतर का दर्द ऐसा ही है लेकिन किसी को इसकी परवाह नहीं है।
लखनऊ कचहरी ब्लास्ट के आरोपियों को 11 साल बाद दोषी सिद्ध किया गया। मगर, बनारस कचहरी ब्लास्ट के पीड़ितों का 11 साल बाद भी किसी एजेंसी ने बयान तक नहीं दर्ज किया। इस आतंकी हमले से संबंधित मुकदमे की मौजूदा स्थिति क्या है, इस बारे में पूछे जाने पर जिम्मेदार अधिकारी ठोस जवाब देने से कतराते हैं। इन हालात में जायजा लगाया जा सकता है कि आतंकी हमले में नौ मौतों और 51 लोगों के घायल होने की देश विरोधी घटना को लेकर पुलिस, प्रशासन और सुरक्षा एजेंसियां कितनी गंभीर हैं।
23 नवंबर 2007 को लखनऊ और फैजाबाद के साथ ही जिले के दीवानी कचहरी परिसर में दो सीरियल ब्लास्ट हुए थे। इस धमाके में गंभीर रूप से घायल हुए वरिष्ठ अधिवक्ता वशिष्ठ नारायण मिश्र ने शुक्रवार को ‘अमर उजाला’ से कहा कि मैं खुद पीड़ित हूं। आज तक पुलिस या विवेचना से जुड़े किसी भी अधिकारी ने दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 161 के तहत हमारा बयान भी नहीं दर्ज किया। हमने तो बहुत कुछ खो दिया इस धमाके में... वकालत चौपट हो गई। 15 लाख से ज्यादा उपचार में खर्च हो गए और सरकार से चार लाख मिले। कोई सुधि नहीं लेता है, पीड़ित परिवारों को मुआवजा मिले और अभियोजन की कार्रवाई सही तरीके से हो। धमाके के बाद अधिवक्ता अमरनाथ दुबे, त्रिभुवन मिश्र को सुनाई देना बंद कर दिया था। एक रुपया मुआवजा नहीं मिला। दोनों अधिवक्ताओं ने कहा कि आतंकवादियों को फांसी की सजा हो और त्वरित गति से ट्रायल हो।
कचहरी धमाके में जान गंवाने वाले अधिवक्ता भोलानाथ सिंह के पुत्र प्रशांत सिंह भी वकालत करते हैं। पिता का जिक्र करते ही प्रशांत की आंखें डबडबा जाती हैं। कहा कि मां ने बड़ी पीड़ा के साथ परवरिश की है। पिता की मौत की बाद हम पर क्या गुजरी, इसे कोई और नहीं समझ सकता है। कहा कि जिस तरह से लखनऊ कचहरी धमाके के आरोपियों को दोषी करार दिया गया है वैसी ही कार्रवाई यहां के मामले में भी हो। बाएं कान की श्रवण शक्ति खोने वाले ज्ञानेश्वर ने कहा कि ना जाने कब न्याय मिलेगा, देखते हैं। ऐसा इंतजाम हो कि ऐसी घटनाएं न हों और आतंकियों को फांसी की सजा मिलेे।
गाजियाबाद की जिला अदालत में हो रही है सुनवाई
कचहरी बम धमाके में हुई मौत का मुकदमा कैंट थाने में तत्कालीन इंस्पेक्टर इंद्रजीत चतुर्वेदी ने दर्ज कराया था। बाद में इसकी तफ्तीश एंटी टेररिस्ट स्क्वॉड को सौंप दी गई थी। मौजूदा इंस्पेक्टर कैंट के अनुसार इस प्रकरण की सुनवाई गाजियाबाद की जिला अदालत में चल रही है। इस मामले में कश्मीर के सज्जादुर्रहमान व मो. अख्तर, जौनपुर के खालिद मुजाहिद और आजमगढ़ के तारिक आजमी सहित अन्य के खिलाफ गंभीर आपराधिक और राष्ट्र विरोधी गतिविधियों के आरोपों में मुकदमा दर्ज किया गया था। पिछली सपा सरकार के कार्यालय में दो आरोपियों से मुकदमे की वापसी का निर्णय लिया गया था। इसे लेकर अधिवक्ताओं सहित कई संगठनों ने विरोध जताते हुए आंदोलन का आह्वान किया था। इसके बाद अदालत ने भी स्पष्ट किया कि प्रदेश सरकार आतंकवाद के आरोपियों से मुकदमा वापस नहीं ले सकती है।