वाराणसी। ध्रुपद के रागों, बंदिशों पर सुर, लय, ताल की मनोहारी प्रस्तुति शुक्रवार की शाम यादगार बन गई। गुुंदेचा बंधुओं की आलापचारी ने मन मोहा तो पखावज पर परन, पराल और रेला की गूंज मची। बीएचयू के पं. ओंकार नाथ ठाकुर प्रेक्षागृह में ध्रुपद महोत्सव की दूसरी निशा ऐसे ही भावों के साथ सजी। यह महोत्सव इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र, भारत अध्ययन और संगीत एवं मंच कला संकाय के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित किया गया है।
भोपाल से आए गुंदेचा बंधुओं के ध्रुपद गायन से महोत्सव की दूसरी निशा की शुरुआत हुई। इन्होंने डागर घराने की परंपरा को जीवंत किया। शुरुआत की राग मुल्तानी से। इसके बाद सूल ताल में देवी दयानी... पर सुर लगाया। पखावज पर अंकित पारिख, तानपूरे पर पूर्णिमा कुमारी और अंजलि ने संगत की। इनके बाद पृथ्वीराज कुमार ने पखावद पर पराल, परन, रेला बजाकर लोगों को मंत्रमुग्ध कर दिया। सारंगी वादक पं. संतोष मिश्र ने लहरा दिया।
इनके बाद डॉ. विशाल जैन ने राग जोग कौंस में चार ताल की बंदिश- माई री आज को दिन... की प्रस्तुति की। राग भूपाली में चार ताल में निबद्ध बंदिश- बरसत घटा... की प्रस्तुति की। इनके साथ पखावज पर अखिलेश गुंदेचा ने और सारंगी पर अनीश मिश्र ने संगत की। संकाय प्रमुख के. शशि कुमार ने धन्यवाद ज्ञापित किया। संचालन ज्योति सिंह ने किया। इस मौके पर प्रो. ऋत्विक सान्याल, इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र के निदेशक विजय शंकर शुक्ल, सचिव डॉ. सच्चिदानंद जोशी समेत तमाम लोग उपस्थित थे।