वाराणसी। तेरह महीने पहले बड़े-बड़े दावों के साथ चुने गए पदाधिकारी और उनके सरपरस्त आला प्रशासनिक अधिकारी बनारस क्लब की जमीन के पट्टे के नवीनीकरण का मामला नहीं सुलझा पाए। नवीनीकरण का मामला 1995 से टलता आ रहा है।
नवीनीकरण नहीं हो सका है।इस दौरान एक उपलब्धि यह जरूर रही कि पदाधिकारियों को क्लब की जमीन की रजिस्ट्री के कई साल से गायब कागजात अचानक मिल गए। क्लब ने पूरे मामले की जांच कर रही समिति को यह दस्तावेज उपलब्ध करा दिए हैं। एडीएम प्रशासन एमएन उपाध्याय ने इस पर डीएम को रिपोर्ट भी सौंप दी है। अब आने वाले दिनों में इस रिपोर्ट के आधार पर अफसरों और क्लब पदाधिकारियों की मुसीबत बढ़ने वाली है। सपा के नरेश उत्तम की अगुवाई वाली विधान परिषद कमेटी की बैठक में इस रिपोर्ट पर सवाल उठाए जाने की संभावना है। कमेटी की बैठक नवंबर में होने की उम्मीद है।
बनारस क्लब ने 27 जून, 1935 को वाराणसी के तत्कालीन कलेक्टर से दो एकड़ जमीन की रजिस्ट्री कराई थी और इसी दिन 1.33 एकड़ जमीन का पट्टा कराया गया था। जिस जमीन का पट्टा हुआ था, वह नजूल की थी। डीएम को नजूल की जमीन का पट्टा करने का अधिकार है लेकिन जानकार कहते हैं कि इसके लिए जिला जज की सहमति आवश्यक है और क्लब के मामले में इस नियम का पालन नहीं किया गया। बैठक में इससे जुड़े रिकॉर्ड देखे जाएंगे।
कंपनी एक्ट में रजिस्टर्ड क्लब में प्रशासन के उच्चाधिकारियों के पदाधिकारी बनाने का मुद्दा भी बैठक में उठ सकता है। प्रचलित आचार संहिता के हिसाब से कोई प्रशासनिक अधिकारी सरकार से अनुमति लिए बगैर किसी निजी संस्था में कोई जिम्मेदारी नहीं संभाल सकता। जानकारों का कहना है कि 1985 से पहले इस क्लब में भी ऐसा ही था। 1985 में तत्कालीन अधिकारियों और क्लब पदाधिकारियों ने मिलकर तय कर लिया कि जब तक कमिश्नर क्लब के अध्यक्ष रहेंगे, तब तक जमीन का पट्टा रहेगा। उसी समय तत्कालीन जिलाधिकारी आरएस टोलिया ने बैक डेट में लीज का रिन्यूवल कर दिया था। बाद में जिलाधिकारी को क्लब का पदेन उपाध्यक्ष बनाया जाने लगा।