उत्तर प्रदेश में सरकारी नौकरियों में प्रमोशन में आरक्षण खत्म करने संबंधी विधेयक को राज्यपाल बीएल जोशी ने मंजूरी दे दी है। इसके बाद उत्तर प्रदेश लोक सेवा (अनुसूचित जातियों, अनुसूचित जनजातियों और अन्य पिछड़े वर्ग के लिए आरक्षण) (संशोधन) विधेयक अब अधिनियम (एक्ट) बन गया है।
चूंकि सरकार ने विधानमंडल की मंजूरी लेकर प्रमोशन में आरक्षण के प्रावधान वाली उपधारा-सात को निकाल दिया है और इस प्रावधान को राज्यपाल ने मंजूरी दे दी। इस उपधारा के तहत ही प्रदेश में सरकारी नौकरियों प्रमोशन में आरक्षण की व्यवस्था की गई थी।
विदित हो प्रमोशन में आरक्षण का प्रावधान खत्म करने के फैसले पर बसपा सख्त एतराज जताती रही है। उधर, सपा सरकार ने प्रमोशन में आरक्षण तो खत्म कर दिया लेकिन अभी तक प्रोन्नत हो चुके कार्मिकों को रिवर्ट करने का फैसला नहीं कर पाई है। सरकार ने इस पर विधिक राय ली है लेकिन अभी तक कोई फैसला नहीं हो पाया है।
प्रमोशन में आरक्षण और परिणामी ज्येष्ठता का लाभ खत्म करने के लिए सपा सरकार ने उप्र लोकसेवा (अनुसूचित जातियों, अनुसूचित जनजातियों और अन्य पिछड़े वर्गों के लिए आरक्षण) (संशोधन) विधेयक-2012 को पिछले साल दिसंबर में विधानमंडल से पास कराकर राज्यपाल को मंजूरी के लिए भेजा था।
प्रदेश सरकार का ने यह विधेयक केंद्र सरकार द्वारा प्रमोशन में आरक्षण विधेयक लाने के बाद लाया था। गौरतलब है संसद के पिछले सत्र में केंद्र सरकार ने राज्य सभा में प्रमोशन में आरक्षण विधेयक पारित कराया था। सपा के विरोध के कारण लोकसभा में यह विधेयक पेश नहीं हो पाया था।
अब उत्तर प्रदेश विधानमंडल ने प्रमोशन में आरक्षण की व्यवस्था खत्म कर दी है जबकि देश की संसद विधेयक पर मोहर लगा चुकी है। ऐसे में सवाल उठना लाजमी हो गया है कि क्या ये दोनों संस्थाएं एक दूसरे को चुनौती दे रही है? संसद में जो विधेयक पारित हो चुका है, क्या विधान सभा में उसका विरोध ठीक है?
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