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अतरौली की दास्तान: काले शीशे वाली गाड़ी में बाबूजी के घर लोग आते हैं, चेहरा दिखाए बगैर केवल घूम कर लौट जाते हैं

सार

अतरौली गांव के अनुज अग्रवाल अमर उजाला से कहते हैं कि आज तक हमारे विधायक हम लोगों से मिलने तक नहीं आए। केवल यहां बड़े-बड़े प्रभावशाली लोगों से मिलने आते हैं। इसके बाद लौट जाते हैं। खानापूर्ति के लिए सप्ताह में एक या दो दिन जनता दरबार सजाते हैं लेकिन आम आदमी का कोई काम नहीं होता है...
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पूर्व मुख्यमंत्री कल्याण सिंह का परिवार - फोटो : Amar Ujala
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विस्तार
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राम मंदिर के नायक रहे पूर्व मुख्यमंत्री कल्याण सिंह की परंपरागत सीट पर आरएलडी और समाजवादी पार्टी के गठबंधन के बाद से ही क्षेत्र के राजनीतिक समीकरण फ़िलहाल बदले हुए नजर आ रहे हैं। एक ओर जहां गठबंधन के उम्मीदवार ने पूरी ताकत झोंक दी है, दूसरी तरफ कल्याण सिंह के पौत्र भी अपने दादा की सियासी विरासत को आगे बढ़ाने के लिए मैदान में हैं। हालांकि गांव के लोग बेरोजगारी, फैक्टरी, ठप पड़े उद्योग और अस्पताल में सुविधाओं के अभाव को अहम चुनावी मुद्दे मान रहे हैं। उनका कहना है कि कल्याण सिंह यहां से कई बार विधायक रहे, मुख्यमंत्री रहे। उनकी बहू और पोते भी विधायक रहे लेकिन इतने सालों में आजतक एक भी बड़ी फैक्टरी नहीं लगवा सके। ये बड़े लोग केवल काले शीशे वाली बड़ी गाड़ियों में आते हैं और केवल चेहरा दिखाकर फिर लौट जाते हैं।

रोजगार के लिए अलीगढ़ पर निर्भर है लोग

अतरौली गांव के अनुज अग्रवाल अमर उजाला से कहते हैं कि आज तक हमारे विधायक हम लोगों से मिलने तक नहीं आए। केवल यहां बड़े-बड़े प्रभावशाली लोगों से मिलने आते हैं। इसके बाद लौट जाते हैं। खानापूर्ति के लिए सप्ताह में एक या दो दिन जनता दरबार सजाते हैं लेकिन आम आदमी का कोई काम नहीं होता है। इस सीट से कई बार कल्याण सिंह खुद, उनकी पुत्रवधु प्रेमलता वर्मा और उनके पोते भी विधायक रहे हैं। केंद्र और राज्य में सरकार होने के बावजूद आज तक इस गांव में कोई फैक्टरी नहीं लगवा सके हैं। जिसके कारण पूरे गांव के लोगों के सामने रोजगार का संकट बना रहता है।

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गांव के निवासी संदीप बताते हैं कि आज पूरे गांव के लोग रोजगार की तलाश में अलीगढ़ जाते हैं। वहीं सभी लोग अपना रोजगार करते हैं। गांव के लोग छोटे-मोटे काम धंधा कर अपना व्यापार व्यवसाय चलाते हैं। अतरौली में कोई बड़ा कारोबार नहीं होने की वजह से यहां के छोटे मजदूरों के सामने हमेशा से रोजी-रोटी का संकट बना रहता है। कई बार हम लोगों ने स्थानीय जनप्रतिनिधियों के सामने यहां रोजगार के लिए कारखाने समेत छोटे उद्योग शुरू करने की बातें रखी लेकिन कुछ नहीं हुआ।

स्थानीय लोगों का आरोप है कि गांव में 100 बेड का अस्पताल तो जरूर बना है लेकिन यहां डॉक्टरों की कोई व्यवस्था नहीं है। केवल नाम का अस्पताल बना दिया गया है लेकिन लोगों का इलाज ठीक से नहीं होता है। गांव में बड़ा अस्पताल होने के बाद भी लोगों को अलीगढ़ समेत अन्य शहरों पर इलाज के लिए निर्भर होना पड़ता है।

शिक्षा राज्यमंत्री के गांव में बने स्कूल

हालांकि स्कूली शिक्षा के क्षेत्र में यहां हुए कुछ कामों की लोग तारीफ भी करते हैं। गांव वालों का कहना है कि वर्तमान विधायक और कल्याण सिंह के पौत्र संदीप सिंह योगी सरकार में शिक्षा राज्यमंत्री हैं। इसका फायदा गांव के बच्चों को मिला है। जो स्कूल के भवन पहले खराब हालत में थे अब वह अच्छे हो गए हैं। गांव में पहले की तुलना में प्राथमिक विद्यालय भी बढ़ गए हैं। अब बच्चों को पढ़ाई और सुविधाओं के लिए परेशान नहीं होना पड़ता है।  

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वहीं स्थानीय निवासी प्रेम सिंह का कहना है कि संदीप सिंह के विधायक बनने के बाद से शहर के सौंदर्यीकरण, सड़कें और साफ सफाई पर तेजी से काम हुआ है। आज हर जगह सड़कें नई बन गई हैं। अतरौली को अलीगढ़ या अन्य बड़े शहरों से जोड़ने वाली सभी बड़ी और अहम सड़कें इसी दौरान बनाई गई हैं।

 

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पूर्व मुख्यमंत्री कल्याण सिंह का गांव - फोटो : Amar Ujala

कल्याण सिंह का गढ़ रहा है अतरौली

गांव मढ़ौली निवासी कल्याण सिंह पहली बार 1967 में जनसंघ के टिकट पर विधायक निर्वाचित हुए थे। उसके बाद पीछे मुड़कर नहीं देखा। 1969, 1974, 1977, 1985, 1989, 1991, 1993, 1996 और 2002 में लगातार यहां से चुनाव जीतते रहे। अतरौली से निकलकर प्रदेश एवं देश की राजनीति में छा गए। दो बार मुख्यमंत्री एवं राजस्थान के राज्यपाल बने।

उनकी पुत्रवधु प्रेमलता वर्मा दो बार यहां से विधायक निर्वाचित हुईं। हालांकि 2012 में सपा के वीरेश यादव ने कल्याण सिंह के इस गढ़ पर कब्जा किया था। लेकिन 2017 में फिर से अतरौली विधान सभा सीट कल्याण सिंह परिवार की झोली में आ गई। उनके पौत्र संदीप सिंह विधायक चुने गए और प्रदेश सरकार में राज्यमंत्री बने। भाजपा ही नहीं बल्कि दूसरी पार्टियों के लिए भी अतरौली विधान सभा क्षेत्र हमेशा महत्वपूर्ण रही है। यहां होने वाली जीत हार का संदेश बहुत दूर तक जाता है।

पहली बार कल्याण सिंह के बिना चुनाव

पिछले साल पूर्व मुख्यमंत्री कल्याण सिंह का निधन हो गया। यह पहला मौका होगा जब कल्याण सिंह की गैरमौजूदगी में उनके परिवार के सदस्य विधानसभा का चुनाव लड़ रहे हैं। संदीप सिंह के पिता राजवीर सिंह उर्फ राजू भैया एटा से सांसद हैं।

26 वर्ष की उम्र में संदीप पहली बार बने थे विधायक

वित्त, चिकित्सा शिक्षा एवं प्राविधिक शिक्षा राज्यमंत्री संदीप सिंह 26 वर्ष की उम्र में पहली बार विधायक बने थे। दिल्ली विश्वविद्यालय से स्नातक एवं ब्रिटेन से पब्लिक रिलेशंस में पोस्ट ग्रेजुएशन की डिग्री हासिल की है। राज्यमंत्री के साथ ही हापुड़ जनपद में प्रभारी मंत्री हैं। चार भाई-बहनों में संदीप सिंह सबसे बड़े हैं।
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