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उत्तर प्रदेश चुनाव: सीएम योगी की घोषणा के बाद भी अटलजी के पैतृक गांव में नहीं बना उनका म्यूजियम, स्कूल और सड़क का सपना भी अधर में

सार

बटेश्वर दिवंगत पूर्व पीएम अटल बिहारी वाजपेयी का पैतृक गांव रहा है। वाजपेयी ने भारत छोड़ो आंदोलन में इसी गांव से भाग लिया था और यहीं से वह और उनके भाई गिरफ्तार किये गए थे। इस तरह इस गांव से उनके राजनीतिक जीवन का प्रारंभ हुआ। दूसरे यमुना नदी के तट पर 101 शिव मंदिरों के कारण इसे 'मिनी-काशी' के नाम से भी जाना जाता है। पढ़ें हमारे विशेष संवाददाता की बटेश्वर से ग्राउंड रिपोर्ट...
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अटल बिहारी वाजपेयी का गांव बटेश्वर - फोटो : Amar Ujala
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विस्तार
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उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनाव में फिर से सत्ता पर काबिज होने के लिए भाजपा कोई कसर नहीं छोड़ना चाहती है। इसके लिए पार्टी अपने दिवंगत नेताओं के द्वारा किए गए कार्यों के अलावा उनके नाम को भी जमकर भुनाती हुई दिख रही है। चाहे वह पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी हों या फिर पूर्व सीएम कल्याण सिंह। लेकिन इन चुनावी शोरगुल में भारत रत्न स्व. अटल बिहारी वाजपेयी का गांव बटेश्वर अपनी बदहाली की कहानी खुद ही बयां कर रहा है। केंद्र में मोदी सरकार और राज्य में योगी सरकार होने के बावजूद पूर्व पीएम के गांव में न तो पक्की सड़क है न ही कोई स्कूल। स्थानीय लोगों को रोजगार के लिए भी आसपास के दूसरे गांवों पर निर्भर होना पड़ता है। राज्य सरकार ने वाजपेयी के गांव में एक कन्या महाविद्यालय और पूर्व पीएम का म्यूजियम बनाने की घोषणा जरूर की है, लेकिन धरातल पर सिवाय एलान के कुछ भी नजर नहीं आ रहा है।

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बाह विधानसभा की चुनावी कवरेज के दौरान जब अमर उजाला की टीम क्षेत्रीय विधायक और भाजपा प्रत्याशी रानी पक्षालिका से चर्चा के लिए पहुंची तो वे क्षेत्र के विकास बड़े दावे करती हुईं नजर आईं। उन्होंने दावा करते हुए कहा कि मैंने अपने कार्यकाल में सड़क, पानी और किसानों के लिए खूब काम किया है। किसानों के लिए चंबल डाल योजना से सिंचाई के लिए 30 करोड़ रुपये से नए पंप लगवाए। पर्यटन को बढ़ाने के लिए पूर्व पीएम वाजपेयी के पैतृक गांव बटेश्वर को विकसित कर रहे हैं, ताकि वहां लोग शिव मंदिर के दर्शन के साथ वाजपेयी का म्यूजियम भी देख सके। इस प्रोजेक्ट पर राज्य सरकार 14 करोड़ रुपये खर्च कर रही है। विधायक के दावों की हकीकत जानने के लिए जब हम बटेश्वर पहुंचे तो वहां स्थिति कुछ और ही नजर आई।  

न सड़क, न रोजगार

स्थानीय निवासी मुन्ना शर्मा कहते है कि कहने के लिए हमारी विधायक उत्तर प्रदेश विधानसभा की सबसे अमीर विधायकों में से एक हैं, लेकिन विकास के मामले में हमारा क्षेत्र सबसे गरीब है। पूर्व पीएम के नाम पर भाजपा वाले वोट मांगते हैं लेकिन उनके गांव के विकास की कोई सुध लेने वाला तक नहीं है। बरसात के मौसम में यहां की सड़कें नदियां बन जाती हैं। स्थानीय जनप्रतिनिधि कोई ध्यान नहीं देते है। सीएम योगी बहुत सारी घोषणाएं कर गए, लेकिन जमीन पर अभी तक कुछ नहीं उतरा। बटेश्वर महादेव के कारण यहां छोटा-मोटा पर्यटन चल जाता है, नहीं तो यहां के लोगों के पास रोजगार के लिए कोई काम नहीं है। स्थानीय युवा पंकज कुमार कहते है कि बच्चों के लिए स्कूल है लेकिन 12वीं बाद शिक्षा के लिए छात्रों को आगरा, लखनऊ जाना पड़ता है। पूरे क्षेत्र में एक भी बड़ी फैक्टरी तक नहीं है। यहां के शिक्षित युवाओं के पास भी दिनभर क्रिकेट और ताश खेलने के अलावा कोई और काम नहीं है।

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पूर्व पीएम वाजपेयी के भतीजे और स्थानीय निवासी राकेश वाजपेयी - फोटो : Amar Ujala

बहुत धीमी गति से हो रहा है काम

अमर उजाला से चर्चा में पूर्व पीएम वाजपेयी के भतीजे और स्थानीय निवासी राकेश वाजपेयी कहते हैं कि सीएम योगी सितंबर 2018 को अटलजी की अस्थियां विसर्जन करने आए थे, उस दौरान हमने उनसे कन्या महाविद्यालय, वाजपेयी जन्म स्थान बनाने, बाह को जिला और बटेश्वर को तहसील बनाने की मांग की थी। इसके अलावा पीएम रहते हुए जब अटलजी ने 1996 में जो रेल लाइन की उद्घाटन किया उसी लाइन पर एक स्टेशन बनाने की मांग की थी ताकि क्षेत्र में रोजगार बढ़ सके। इसके अलावा पर्यटन के मद्देनजर बटेश्वर महादेव मंदिर और घाटों के जीर्णोद्धार की मांग रखी थी। कुछ घाटों के काम तो शुरू कर दिए हैं। वहीं अटल सांस्कृतिक संकुल केंद्र और कन्या महाविद्यालय काम भी शुरू कर दिया है, लेकिन इसकी गति बहुत धीमी नजर आ रही है।

बटेश्वर दिवंगत पूर्व पीएम अटल बिहारी वाजपेयी का पैतृक गांव रहा है। वाजपेयी ने भारत छोड़ो आंदोलन में इसी गांव से भाग लिया था और यहीं से वह और उनके भाई गिरफ्तार किये गए थे। इस तरह इस गांव से उनके राजनीतिक जीवन का प्रारंभ हुआ। दूसरे यमुना नदी के तट पर 101 शिव मंदिरों के कारण इसे 'मिनी-काशी' के नाम से भी जाना जाता है। तीसरी सबसे बड़ी खासियत यह है कि बिहार के सोनपुर के पशु मेले के बाद दूसरा सबसे बड़ा पशु मेला यहां लगा करता है।

हमेशा रहता है राजघराने का वर्चस्व

यूपी की सियासत में कोई भी आए या जाए, लेकिन आगरा के बाह विधानसभा क्षेत्र में राजघराने का वर्चस्व रहा है। पिछले 17 चुनावों में यहां 11 बार भदावर घराने का ही सदस्य विधायक चुना गया। एक बार फिर भाजपा ने इस सीट से रानी पक्षालिका सिंह को प्रत्याशी बनाया है। सपा-रालोद गठबंधन से मधुसूदन शर्मा उम्मीदवार हैं। जबकि कांग्रेस ने महिला प्रत्याशी मनोज दीक्षित और बसपा ने निषाद समाज के नए चेहरे नितिन वर्मा को चुनाव मैदान में उतारा है। क्षत्रिय, ब्राह्मण और निषाद (मल्लाह) बहुल इस क्षेत्र में फिर विपक्षी दल राजघराने की घेराबंदी में जुटे हैं।

1962 में पहली बार इस सीट पर भदावर घराने का परचम लहराया। तब महेंद्र रिपुदमन सिंह यहां से निर्दलीय लड़े और जीते। उसके बाद से 11 बार चुनावों में राजघराने का ही कोई सदस्य यहां झंडा बुलंद करता रहा। बाह का ज्यादातर क्षेत्र चंबल के बीहड़ में आता है। 2007 में बसपा से उतरे मधुसूदन शर्मा ने राजघराने के वर्चस्व को तोड़ा था। महेंद्र अरिदमन सिंह को हराकर मधुसूदन ने बड़ा उलटफेर किया था। लेकिन पांच साल बाद ही फिर यह सीट राजघराने के कब्जे में चली गई। 2012 में अरिदमन ने सपा के टिकट पर यहां वापसी की। राज्य में कैबिनेट मंत्री बने। 2017 के चुनाव में राजा की जगह रानी पक्षालिका सिंह भाजपा से विधायक बनीं। इस बार सपा-रालोद गठबंधन से मधुसूदन शर्मा के उतरने से यहां मुकाबला दिलचस्प हो गया।
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