उन्नाव/सोनिक। स्लॉटर हाउस और फैक्ट्रियों में काम करने वालों का हर तीन महीने में एलआईयू की ओर से पूरी कराई जाने वाली सत्यापन प्रक्रिया में पता चला है कि जिस बांग्लादेशी सैफुल को एटीएस ने पकड़ा है उसका सत्यापन फार्म ही नहीं भरा गया था। इससे मामला और गंभीर दिख रहा है। इन दोनों बांग्लादेशियों को नूर मोहम्मद ने ही शरण दी थी। विभागीय लोगों का मानना है कि अगर पुलिस उस पर सख्ती से कार्रवाई करे तो और भी राज पर्दाफाश होंगे।
एटीएस के हत्थे चढ़ा बांग्लादेशी सैफुल शिवनगर मोहल्ले में एहतिशाम के घर में कई साल से किराये का कमरा लेकर रह रहा था। यह घर दही थाने के पास ही है, उसके बाद भी पुलिस को इसकी भनक तक नहीं लगी। सबसे खास बात जेल से छूटने के बाद पुलिस ने नूर मोहम्मद पर शिकंजा कसना तो दूर उसकी हरकतों पर भी नजर नहीं रखी। इसका असर यह हुआ कि दूसरा बांग्लादेशी सैफुल भी गिरफ्तार किया गया और वह भी नूर मोहम्मद के जानने वाला निकला।
सूत्र बताते हैं कि सैफुल पहले नूर मोहम्मद के कुत्ते का बिस्किट बनाने वाली फैक्टरी में मजदूरी करता था। उसके बाद स्लाटर हाउस पहुंच गया और ठेकेदारी करने लगा। चर्चा यह भी है कि अगर सही से जांच कराई जाए तो यह भी पता चलेगा कि कहीं मजदूरों की आड़ में और किसी बांग्लादेशी को तो काम पर नहीं रखा गया। सबसे अहम बात यह है कि सत्यापन के दौरान सैफुल के सत्यापन का फार्म एलआईयू को न मिलने से भी सवाल खड़े होते हैं कि कोई न कोई तो ऐसा रहा होगा जिसको इसके बांग्लादेशी होने की जानकारी थी और सत्यापन के समय उसका नाम शामिल नहीं किया गया। यह व्यवस्था सुरक्षा पर भी सवाल खड़े कर रही है। सूत्रों की माने तो सैफुल को शरण देने वाले नूर मोहम्मद के जेल जाने के बाद उसे जमानत दे दी गई। अगर उसी समय उससे कड़ाई से पूछताछ होती तो शायद यह दूसरा बांग्लादेशी एटीएस के हत्थे न चढ़ता।
एलआईयू इंस्पेक्टर समरपाल ने बताया कि अभी तक की जांच में सैफुल के सत्यापन का फार्म नहीं मिला है। इसका पता लगाया जा रहा है। सत्यापन एलआईयू और पुलिस दोनों की तरफ से कराया जाता है।