उन्नाव। संवेदनाओं को दरकिनार कर शवों को घर पहुंचाने के नाम पर भी घोटाला किया जा रहा है। जिला अस्पताल के शव वाहनों से जिन शवों को उनके घर पहुंचाना दिखाया गया है, हकीकत में उन्हें परिजन लोडर या निजी एंबुलेंस से लेकर गए। बृहस्पतिवार को जिला अस्पताल में इलाज के लिए दो घंटे इंतजार के दौरान मृत बुजुर्ग के शव को बेटा 1300 रुपये देकर किराये के लोडर से लेकर गया लेकिन जिला अस्पताल के रजिस्टर में इसे शव वाहन से भेजना दर्ज है। इतना ही नहीं रजिस्टर पर दर्ज तीन अन्य मृतकों के परिजनों से बात की गई तो उन्होंने भी शव वाहन न मिलने की बात बताई।
जिला अस्पताल में दो और सीएमओ कार्यालय में एक शव वाहन है। शासन के निर्देश हैं कि अस्पताल में मृत्यु के बाद शव को सम्मानपूर्वक परिजनों के घर तक निशुल्क पहुंचाया जाए लेकिन जिम्मेदार शव पहुंचाने के नाम पर भी घालमेल कर रहे हैं। पड़ताल में खुलासा हुआ कि तीनों शव वाहन जिला अस्पताल परिसर में ही खड़े रहते हैं। मरीज की मौत पर परिजन खुद ही निजी एंबुलेंस (वैन) या लोडर, टेंपो से शव घर तक ले जाते हैं।
हर महीने लिया जा रहा भुगतान
सरकारी शव वाहनों के लिए डीजल, मेंटीनेंस और ड्राइवर का भुगतान हर महीने सरकारी फाइलों में दिखाया जाता है। सरकारी आंकड़ों के अनुसार एक वाहन पर रोजाना औसतन 15 लीटर डीजल का मासिक खर्च 39 हजार रुपये दिखाया जाता है। तीनों शव वाहनों पर हर महीने केवल डीजल पर ही 1.18 लाख रुपये खर्च दिखाया जा रहा है। सूत्रों का दावा है कि अगर गहन जांच हो तो करोड़ों रुपये के घोटाले का खुलासा होगा।
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केस-एक
अचलगंज थाना क्षेत्र के गड़सर गांव निवासी मोहन लाल (70) की तबीयत खराब होने पर शुक्रवार की सुबह बेटी गंगाजली, बेटा गंगासागर व पत्नी रजाता उन्हें लेकर जिला अस्पताल के इमरजेंसी वार्ड पहुंचे। डॉक्टरों ने ओपीडी में दिखाने की बात कही। ओपीडी में नंबर आने से पहले ही उनकी मौत हो गई। परिजनों ने इमरजेंसी में तैनात डॉक्टर से शव वाहन भेजने की बात कही तो बोले वाहन नहीं है। प्राइवेट वाहन से शव लेकर चले जाओ। बेटे गंगासागर ने बताया कि डॉक्टर ने खुद प्राइवेट वाहन बुला दिया जिससे शव लेकर घर गए। उनसे 1300 रुपये लिए गए।
केस-दो
मौरावां थाना क्षेत्र के लोहानीपुर निवासी मनोज (40) मार्ग दुर्घटना में 19 अक्तूबर को घायल हो गए थे। परिजन जिला अस्पताल के इमरजेंसी वार्ड लेकर पहुंचे। इलाज के दौरान मौत हो गई थी। पोस्टमार्टम के बाद शव ले जाने के लिए सरकारी वाहन नहीं मिला। जिला अस्पताल की लॉगबुक में मनोज का शव सरकारी वाहन से उनके घर पहुंचाने का ब्योरा दर्ज है। भाई चंद्रमणि ने बताया कि 4500 रुपये किराये पर पिकअप लेकर शव को घर लेकर गए थे। सरकारी शव वाहन नहीं मिला था।
केस-तीन
गदनखेड़ा की विमला मार्ग दुर्घटना में घायल हो गई थीं। परिजन इलाज के लिए 23 अक्तूबर को जिला अस्पताल लेकर पहुंचे। इमरजेंसी वार्ड में इलाज के दौरान मौत हो गई थी। भाई रोहित ने बताया कि पोस्टमार्टम के बाद शव घर ले जाने के लिए सरकारी वाहन नहीं मिला। 1000 रुपये में लोडर किराये पर लेकर गए थे। उन्हें बताया गया कि जिला अस्पताल के रजिस्टर में शव को सरकारी वाहन से निशुल्क घर पहुंचाने की सूचना दर्ज है तो हैरानी जताई।
केस-चार
अजगैन कोतवाली क्षेत्र के संदाना गांव निवासी नौरंग को परिजन इमरजेंसी वार्ड में 24 अक्तूबर को लेकर पहुंचे थे। उनकी इलाज के दौरान मौत हो गई थी। परिजनों ने शव ले जाने के लिए सरकारी वाहन की व्यवस्था के लिए स्टाफ से कहा लेकिन प्रबंध नहीं हुआ। परिजनों का आरोप है कि मजबूरी में किराये पर निजी वाहन से शव घर लेकर गए थे। उन्हें जब बताया गया कि अस्पताल के रजिस्टर में शव को सरकारी वाहन से भेजने की सूचना दर्ज है तो इसे झूठ बताया।
बोले जिम्मेदार
सीएमओ कार्यालय का एक शव वाहन है जो जिला अस्पताल में हर समय उपलब्ध रहता है। जब भी कोई उसकी आवश्यकता बताता है तो लिखित प्रार्थनापत्र लेकर शव को जिले की सीमा में ही घर पहुंचाने के लिए वाहन निशुल्क उपलब्ध कराया जाता है। अगर कोई शिकायत करेगा तो जांच कराकर कार्रवाई की जाएगी। जिला अस्पताल के शव वाहन के बारे में जानकारी नहीं है। -डॉ. सत्यप्रकाश सीएमओ।
जिला अस्पताल में मृत मरीजों या घायलों के शव को घर ले जाने के लिए अगर कोई परिजन वाहन की मांग करता है तो पहुंचाने की जिम्मेदारी जिला अस्पताल के शव वाहन की है। पोस्टमार्टम के बाद शव ले जाने की जिम्मेदारी सीएमओ कार्यालय के वाहन की है। मांग करने पर भी जिला अस्पताल से किसी शव को वाहन से घर नहीं पहुंचाया गया है तो इसकी जांच कराई जाएगी। -डॉ. जीपी गुप्ता, अपर निदेशक स्वास्थ्य