उन्नाव। जिले में ब्लैक फंगस मरीजों के इलाज के लिए न ही पर्याप्त संसाधन और न ही दवाएं हैं। ऐसे मरीजों को रेफर के अलावा डॉक्टरों के पास कोई दूसरा रास्ता नहीं है। ब्लैक फंगस पर एमआरआई, लीवर व किडनी की जांच होनी आवश्यक है। जिला अस्पताल में सिर्फ सीटी स्कै न के साथ खून की जांच की सुविधा ही है। मरीज को लगने वाला एंफोटेरेसिन बी इंजेक्शन भी जिला अस्पताल में नहीं है। इस इंजेक्शन की कीमत बाजार में सात हजार रुपये है।
कोरोना की दूसरी लहर में ब्लैक फंगस के मरीज तेजी से सामने आ रहे हैं। प्रदेश सरकार ने इसे महामारी घोषित कर दिया है। जिले के स्वास्थ्य महकमे के पास इससे निपटने के कोई इंतजाम नहीं है। डॉक्टरों का कहना है कि पोस्ट कोविड ओपीडी में आ रहे मरीजों का सीटी स्कैन कराया जा रहा है। जांच रिपोर्ट में संक्रमण की पुष्टि होने पर मरीज को लखनऊ रेफर कर दिया जाता है। जिला अस्पताल व निजी अस्पतालों से अब तक छह मरीज लखनऊ रेफर किए जा चुके हैं।
लंबे समय तक ऑक्सीजन पर रहे या अधिक स्टेयराड का प्रयोग करने वाले मरीजों में ब्लैक फंगस हो रहा है। कम इम्युनिटी और डायबिटीज वाले मरीज भी इसकी चपेट में आ रहे हैं। डॉक्टरों का कहना है कि फंगस कोई नई बीमारी नहीं है। पहले बहुत कम लोगों को होता था। इसके लक्षण दिखने पर लापरवाही न बरतें।
जिला अस्पताल के आई सर्जन डॉ. रंजन गुप्ता बताते हैं कि ब्लैक फंगस से पीड़ित मरीजों को सर्जरी की जरूरत पड़ती है। कई मामलों में न्यूरो सर्जन की जरूरत होती है। जिले में ब्लैक फंगस से जुड़े मामलों में न ही सर्जरी की सुविधा और न न्यूरो सर्जन हैं। ऐसी स्थिति में मरीज को लखनऊ रेफर करना मजबूरी है।