मौसम के बदले रुख से इस बार समय से पहले मच्छरों का हमला तेज हो गया है। शहर से लेेकर ग्रामीण क्षेत्र में लोग मच्छरों से पीड़ित हैं। जिला अस्पताल से लेकर सीएचसी, पीएचसी में आने वाले मरीजों में आधे से ज्यादा मच्छर जनित बीमारियों के मरीज हैं। स्वास्थ्य विभाग खुद इसकी तस्दीक कर रहा है। लेकिन जिम्मेदार विभाग अभी तक सो रहे हैं। नगर पालिका फागिंग के लिए समय की लक्ष्मण रेखा में बंधा है। उधर, मलेरिया विभाग मच्छरों का लार्वा मारने के लिए दवा खरीदने के बजट और कर्मचारियों की कमी का रोना रो रहा है। विभागों अनदेखी की लापरवाही के चलते लोग डेंगू, मलेरिया, फाइलेरिया के शिकार हो रहे हैं।
शहर में मच्छरों का प्रकोप जोरों पर है। वहीं रोकथाम के लिए जिम्मेदार विभागों में नगर पालिका फागिंग कराने के लिए बजट तो है लेकिन वह अप्रैल का इंतजार कर रहा है। नगर पालिका के निरीक्षक सुग्रीव सिंह का कहना है कि हर साल फॉगिंग मार्च के अंत में और सितंबर व अक्टूबर में कराई जाती है। शुरूआत 27 मार्च से की जाती है। एक चक्र में शहर के सभी 29 वार्ड में 18 दिन फागिंग कराई जाती है। फागिंग का एक दिन में छह हजार रुपये खर्च होता है। कोई अलग से बजट नहीं आता। शासन से जो बजट स्वीकृत होता है उसी से यह काम करना पड़ता है। उधर, मलेरिया विभाग के पास इस कार्य के लिए कोई बजट ही नहीं है। मलेरिया विभाग के नीरज निगम ने बताया कि हर साल 20-25 हजार रुपये का बजट भेजा जाता है। मच्छरों से बचाव के लिए नालियों में डाले जाने वाले पैराथ्रम पाउडर के लिए मिट्टी के तेल की जरूरत पड़ती है वह भी उपलब्ध नहीं हो पाता। मच्छरों का लार्वा मारने के लिए प्रयोग होने वाला टेमोफास पाउडर की खरीद राज्य स्तर पर होती है। उन्होंने बताया कि इस बार अभी तक बजट नहीं मिला वहीं शहर के 29 वार्डों में लार्वा नाशक के छिड़काव के लिए केवल दो ही कर्मचारी है।
इंसेट
ओपीडी में 60 फीसदी वायरल, बुखार के मरीज
जिला अस्पताल के फिजीशियन डॉ. आलोक पांडेय ने बताया कि पिछले करीब दो सप्ताह से लगभग पूरी ओपीडी वायरल की होकर रह गई है। रोजाना दिखाने आ रही मरीजों में औसतन साठ प्रतिशत मरीज वायरल के होते हैं। उन्होंने बताया कि इसबार ठंड समय से पहले खत्म हो गई है। उन्होंने बताया कि तापामन कम होने से मच्छर बढ़े हैं और इसी वजह से बुखार और वायरल बढ़ रहा है। उन्होंने बताया कि किंगफॉग दवा का घोल बनाकर फांगिंग और पैराथ्रम या टेमोफास का घोलकर का छिड़काव कर मच्छर के लार्वा को मारा जा सकता है।
जिम्मेदारों की जुबां से
एसीएमओ डॉ. एके त्रिपाठी ने बताया कि मच्छरों के काटने से लोगों में डेंगू, मलेरिया, जापानी इंसेफलाइटिस, चिकन गुनिया व माइक्रो फाइलेरिया जैसी बीमारी होने की आशंकाएं अधिक रहती हैं। इस मौसम में मच्छारों की भरमार रहती है। यह सभी बीमारियों बुखार आने के बाद ही पनपती हैं। इसलिए मच्छरों से बचाव अधिक आवश्यक है।
-----------------------
नगर पालिका की ईओ रोली गुप्ता भी मानती हैं कि इस बार मौसम का रुख बदलने से मच्छर समय पूर्व पनप लगे हैं। उन्होंने बताया कि मार्च के अंतिम सप्ताह से फागिंग कराई जाती है। इस बार गर्मी जल्दी शुरू हो गई है। इसलिए मच्छर बढ़े हैं। सफाई निरीक्षकों के साथ बैठक कर फागिंग की व्यवस्था कराई जाएगी।
बचाव के उपाय
1-पानी को कहीं ठहरने न दें। गंदगी व कूड़े के ढेर इकट्ठा न होने दें। डेयरी से निकले गोबर को भी एक जगह एकत्र न होने दें। कूड़े में भी मच्छर खूब पनपते हैं। पानी में मिट्टी का तेल व डीजल की कुछ बूंदे डालें।
2-एडीज मच्छर साफ ठहरे हुए पानी में अंडे देता है। इसलिए कूलर व बर्तन आदि में पानी भरकर न छोड़े।
3-मच्छरदानी व एंटी रेपेलेंट लगाकर सोएं। शरीर पर मच्छर निरोधक औषधियां, नीम या सरसों का तेल लगाएं।
4-बुखार आने पर उसे हल्के में न लें और तुरन्त चिकित्सक को दिखाएं।
5-पूरी आस्तीन के कपड़े पहनें। शरीर को खुला नहीं बल्कि ढककर रखें।
इस मौसम के मच्छर व रोग
एनाफिलीज मच्छर से मलेरिया।
क्यूलेक्स से फाइलेरिया होता।
एडीज से डेंगू व चिकनगुनिया।