श्रीमद्भागवत कथा सुनाते देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज। संवाद
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उन्नाव। भगवताचार्य देवकीनंदन ठाकुर ने कहा कि विनाश के छह मुख्य कारण अत्यधिक निद्रा, क्रोध, भय, थकान, काम को टालने की आदत और आलस्य है। इनका त्याग करने वाला व्यक्ति कभी दुखी नहीं रह सकता।
शेखपुर-करोवन मोड़ पर भागवत कथा ज्ञान यज्ञ के दूसरे दिन कथावाचक देवकीनंदन ठाकुर भागवत ने शुकदेव जी के जन्म की कथा सुनाई। उन्होंने कहा कि जब मनुष्य किसी और के लिए शुभ करता है तो परमात्मा उसके लिए अधिक शुभ करता है। परमार्थी मनुष्य के लिए संसार में कुछ भी दुर्लभ नहीं होता। सिर्फ अपने लिए सोचने वाला व्यक्ति सुखी नहीं रहता। सभी वसुधैव कुटुंबकम के लिए प्रार्थना करें। भगवान के नाम और काम में जोश और होश जवानी में ही लग जाना चाहिए। जो देर करता है उसके जीवन में अंधेर हो जाती है।
कहा कि अभी जवानी का नशा छाया, बड़े मगरूर रहते हो जो सच्चा मार्ग है भक्ति का उसी से दूर रहते हो। जो अपने माता-पिता के प्रति श्रद्धावान होता है उसके जीवन में किसी प्रकार का अभाव नहीं रहता। अपने से बड़ों का सम्मान करो। कभी उनके बराबर में नहीं बैठना चाहिए। पहले अनपढ़ भी अपरिचित बुजुर्ग या अपने से बड़े को देखकर हट जाया करते थे। ईश्वर से प्रार्थना है कि वह सनातनियों को सद्बुद्धि दें। संस्कार विहीन व्यक्ति हिंदू नहीं हो सकता। जो संस्कार दे वही सनातन है। देवकीनंदन ठाकुर ने कथा के दौरान ‘मैं तो आई वृंदावन धाम, किशोरी तेरे चरनन में’ सहित अन्य भजन गाए तो श्रोता झूमने लगे।
भगवताचार्य ने कहा कि कहने के लिए संविधान सबके लिए समान है। एक पक्ष को चार शादी और दूसरे को एक। भगवान करे संविधान सबके लिए बराबर हो जाए। कथा में मौजूद सांसद साक्षी महाराज से कहा कि हम दिल्ली सरकार से भी प्रार्थना करेंगे कि सबकी एक-एक होए और दोय-दोय होएं। हमारी एक और हमारे दो यही कानून सुरक्षित है। जिनके चार हों व लाइन के पार हों।