उन्नाव। प्रयागराज उच्च न्यायालय की लखनऊ पीठ ने वर्ष 2011 के छेड़छाड़ मामले में फैसला सुनाते हुए अपीलकर्ता संजय को सभी आरोपों से बरी कर दिया है। निचली अदालत ने साल 2012 में उसे मर्यादा भंग करने के इरादे से हमला करने और घर में जबरदस्ती दाखिल होने के आरोपों के तहत दो साल की कैद व जुर्माने की सजा सुनाई थी।
अजगैन कोतवाली क्षेत्र के एक गांव निवासी व्यक्ति ने पुलिस को तहरीर देकर बताया था कि 21 अप्रैल 2011 की दोपहर करीब 12:30 बजे वह खेत में था। पत्नी राशन लेने दुकान पर गई थी। 16 वर्षीय बेटी घर में अकेली थी। इस दौरान गांव में रहने वाला संजय घर में दाखिल हो गया और बेटी से छेड़छाड़ करने लगा। पत्नी के घर लौटने पर आरोपी छत के रास्ते भाग निकला।
कुछ देर बाद आरोपी परिजनों के साथ दोबारा लौटा और मारपीट की। शोरगुल सुनकर ग्रामीणों को आता देखकर आरोपी मौके से भाग निकला। पुलिस ने तहरीर के आधार पर आरोपी के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज की। मामले की सुनवाई एडीजे न्यायालय में पूरी हुई। सात अगस्त 2012 को न्यायाधीश ने संजय को दोषी मानकर दो साल की सजा सुनाई थी। जिसके खिलाफ उसने उच्च न्यायालय में अपील की थी। न्यायमूर्ति सुभाष विद्यार्थी की एकलपीठ ने अपील स्वीकार करते हुए कहा कि अभियोजन पक्ष संदेह से परे अपराध साबित करने में पूरी तरह विफल रहा है।
घटना के समय कई ग्रामीणों की मौजूदगी बताई गई, हालांकि किसी भी स्वतंत्र गवाह की गवाही नहीं कराई गई। इसके साथ ही पीड़िता का मेडिकल परीक्षण भी नहीं हुआ। वहीं घटना, चोटों और घटनास्थल को लेकर पीड़िता व उसके माता-पिता के बयानों में गंभीर विरोधाभास रहा। कोर्ट ने माना कि बगैर पुख्ता साक्ष्य व बयानों में विरोधाभासों के आधार पर सजा बरकरार नहीं रखी जा सकती। जिसपर संजय को दोषमुक्त करार दिया गया है।
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तत्कालीन सांसद के हस्तक्षेप से दर्ज हुई थी प्राथमिकी
परिजनों के मुताबिक, मामले की शिकायत करने वह पुलिस के पास पहुंचे थे लेकिन पुलिस ने बिना मेडिकल रिपोर्ट के प्राथमिकी दर्ज करने से मना कर दिया था। जिस पर वह मेडिकल कराने अस्पताल पहुंचे, जहां डॉक्टर ने बिना प्राथमिकी के मेडिकल नहीं किया। घटना के तीन दिन बाद तत्कालीन तत्कालीन सांसद अन्नू टंडन के हस्तक्षेप के बाद पुलिस ने आरोपी के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज की थी।