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देखना चाहेंगे दो लाख साल पुरानी चीजें!

Sat, 07 Jun 2014 08:16 AM IST
संजीव गिरि/अमर उजाला, झांसी
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ऐतिहासिक दृष्टि से महत्वपूर्ण झांसी जिले के मऊरानीपुर क्षेत्र में करीब दो लाख वर्ष पुरानी सभ्यता के प्रमाण मिले हैं। ग्राम लहचूरा में धंसान नदी के किनारे मिट्टी के कटान के बाद चिकने पत्थर से निर्मित औजार (पेबल टूल) प्राप्त हुए हैं।
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इसी तरह, महोबा की गुंछी नदी के किनारे बेलाताल में असूलियन परंपरा से जुड़ी औजार प्राप्त हो चुके हैं। उन स्थानों पर सर्वे के बाद राज्य पुरातत्व विभाग अब खुदाई की तैयारी में है।

अफ्रीका और पाकिस्तान में भी मिले हैं प्रमाण

करीब तीन माह पूर्व मऊरानीपुर के ग्राम लहचूरा में धंसान नदी के किनारे मिट्टी के कटान के बाद ग्रामीणों को चिकने पत्थर से निर्मित औजार नजर आए। ग्रामीणों ने इसकी सूचना पुरातत्व विभाग के अधिकारियों को दी।

पुरातत्व विशेषज्ञों ने इन औजारों हस्त कुठार, खुरचनी, कुल्हाड़ी आदि को अपने कब्जे में लेकर जब जांच शुरू की तो करीब दो लाख वर्ष पूर्व की सभ्यता से मेल खाते मिले। इसी तरह पत्थर से निर्मित औजार अफ्रीका महाद्वीप में भी प्राप्त हो चुके हैं।

वहीं, पाकिस्तान की सोहनघाटी में भी ऐसे ही प्रमाण मिले हैं। हालांकि, विभाग को यहां जीवाश्म (मानव या पशु की हड्डियां) प्राप्त नहीं हुए हैं। इससे उस समय की सभ्यता के बारे में ज्यादा जानकारी नहीं हो पाई है। इससे पहले विभाग द्वारा वर्ष 2001 में कराए गए सर्वे में लहचूरा में मध्यपुरा पाषाण व नव पाषाण काल सभ्यता के प्रमाण मिल चुके हैं।

असूलियन परंपरा के औजार

इसी तरह, महोबा की गुंछी नदी के किनारे ग्राम बेलाताल में असूलियन परंपरा के औजार प्राप्त हुए हैं। ऐसे ही औजार फ्रांस के सेंट असोल से मिले हैं। इसे देखते हुए पुरातत्व विभाग द्वारा पिछले दिनों दोनों जगहों पर सर्वे कराया जा चुका है। साथ ही खुदाई की योजना भी बनाई जा रही है।

बीएचयू के प्रोफेसर की पुस्तक में है जिक्र
बनारस हिंदू विश्वविद्यालय के इतिहास विभाग के प्रोफेसर पीसी पंत ने वर्ष 1982 में लहचूरा का सर्वे किया था। सर्वे के दौरान उन्हें यहां प्राचीन सभ्यता के कई प्रमाण मिले, जिनका जिक्र उन्होंने ‘प्री हिस्टोरिक उत्तर प्रदेश’ नामक पुस्तक में भी किया है।

क्या हैं पेबल टूल
पुरातत्व विशेषज्ञों के अनुसार प्राचीन समय में मानव द्वारा विभिन्न कार्यों के लिए पत्थर के औजारों का प्रयोग किया जाता था। मानव चिकने पत्थर से नुकीले औजार बनाकर इनका प्रयोग मांस छीलने, कंद मूल खोदने व वृक्षों की छाल छीलने में करते थे।
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उन्नत हैं बेलाताल में मिले औजार

लहचूरा और बेलाताल में प्राप्त प्राचीन औजारों की बनावट में विशेषज्ञों ने अंतर पाया है। लहचूरा की अपेक्षा बेलाताल में प्राप्त औजार ज्यादा उन्नत किस्म के हैं। बेलाताल के औजार अधिक नुकीले और पकड़ने में आसान हैं, जबकि लहचूरा में प्राप्त औजार इनसे कम उन्नत हैं।

जालौन में प्राप्त हो चुके हैं जीवाश्म
जालौन के कालपी क्षेत्र में यमुना नदी के किनारे खुदाई के दौरान विभाग को प्राचीन काल से संबंधित दरियाई घोड़ा, हाथी, ऊदबिलाव के जीवाश्म प्राप्त हो चुके हैं। साथ ही सर्वे में 12 फीट लंबा हाथी का दांत भी मिला था। इसे देखते हुए वर्ष 2003 में पुरातत्व विभाग, भूगर्भ विभाग, लखनऊ यूनिवर्सिटी, बनारस हिंदू विश्वविद्यालय द्वारा संयुक्त रूप से खुदाई की गई थी।

राज्य पुरातत्व विभाग लखनऊ के निदेशक पीके सिंह ने बताया कि विभाग को लहचूरा व बेलाताल में प्राचीन सभ्यता के प्रमाण मिले हैं। यहां मिले प्राचीन औजारों का विशेषज्ञों द्वारा विस्तृत अध्ययन किया जाएगा। इसके बाद खुदाई कराई जाएगी।
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