ललितपुर के रहने वाले सुखदीन और उनकी पत्नी को ट्रॉमा की आग ने ऐसे जख्म दिए कि वे जिंदगी भर नहीं भूलेंगे। 26 दिन के अपने बच्चे को लेकर उसकी जिंदगी बचाने की उम्मीद लिए ट्रॉमा सेंटर आए थे। पर, उन्हें क्या मालूम था कि वे यहां अपना सबकुछ खो देंगे।
सुखदीन रोते हुए बताते हैं, किसी तरह से चंदा कर 70 हजार का जुगाड़ किया। तब बच्चे को लेकर यहां आया था। ऑक्सीजन हटा दिया, मेरा बच्चा मर गया। बाल रोग विभाग में शिफ्टिंग के दौरान सुखदीप अपने मरे हुए बच्चे को जिंदा समझ गोद में लेकर भटकता रहा। रात साढ़े दस बजे के करीब उसे बताया गया कि उसका बच्चा मर चुका है।
प्रशासन ने दी अंतिम संस्कार के लिए मदद
सुखदीन के पास महज 12 रुपये बचे थे। जिला प्रशासन की ओर से बच्चे केअंतिम संस्कार की व्यवस्था की गई। मौके पर पहुंचे लेखपाल इदरीस ने बताया कि प्रशासन ने
कहा है कि बच्चे के इलाज पर खर्च रुपये वापस किए जाएंगे।
डेथ मेमो में भी खेल
इतना ही नहीं बच्चे के डेथ मेमो में भी खेल कर दिया गया। पहले पेंसिल से लिख कर दिया, उसके बाद उसमें पेन से टाइम बदल उसे 7.45 से 6.45 कर दिया गया।
संवेदनहीनता की हद : मॉर्च्युरी तक खुद ही बच्चे को लेकर गया
पहले बच्चे की मौत, फिर घंटों उसे छिपाए रखना और इसके बाद मृतक को मॉर्च्युरी तक ले जाने के लिए वैन तक उपलब्ध नहीं कराना। केजीएमयू की संवेदहीनता यहां भी
दिखाई दी। बेटे के गम से निढाल सुखदीप मासूम का शव गोदी में लिए ही मॉर्च्युरी पहुंचा।